रविवार, 22 फ़रवरी 2009
राजिम कुंभ में धर्म और संस्कृति के बीच तड़पता सच्चाई,सागर माली की दास्तां
राजिम कुंभ पर संकट के बादल, आस्था की धरती के साथ मजाक
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009
पेड़ों पर आशियाना

लेकिन इस रिसॉर्ट को खडा करने के लिए केवल कल्पना ही नहीं बल्कि लंबी कानूनी लडाई की भी जरूरत पडी। स्थानीय प्रशासन ने टिकने वालों की सुरक्षा का हवाला देते हुए इसे लाइसेंस नहीं दिया। लाइसेंस न मिला तो किराये पर नहीं दिया जा सकता था, इसलिए इसके संचालकों ने खास टीशर्ट बेचकर कमरे मुफ्त में दिए। आठ साल तक चली कानूनी जंग के बाद स्थानीय प्रशासन ने इन पेड-मकानों में सुरक्षा इंतजामों को स्वीकार किया और इसे लाइसेंस व ग्राहक मिले। आज यह यहां स्थापित ट्रीहाउस इंस्टीट्यूट दुनिया में अकेली जगह है जो ट्रीहाउस बनाने के बुनियादी इंजीनियरिंग, डिजाइन व निर्माण के तरीकों के बारे में गैरव्यावसायिक शिक्षा देती है।
यह रिसॉर्ट अनूठा है, इसलिए कई कायदों वाला है। यहां अलग-अलग सुविधाओं वाले कई ट्रीहाउस हैं। कई ट्रीहाउस ऐसे हैं जो तमाम सुविधाओं से परिपूर्ण हैं। जो नहीं हैं उनके लिए ट्रीरिसॉर्ट में बीच में एक बडा बाथहाउस व पैवेलियन है। मेन हाउस के किचन में हर सवेरे नाश्ता दिया जाता है। पैवेलियन में लांड्री, खेल व किचन की सुविधाएं हैं। लंच व डिनर तैयार करने के लिए बार-बे-क्यू, ग्रिल, कैंपफायर, पिकनिक टेबल वगैरह भी हैं। मजे के लिए झूले हैं, कई तरह के रोमांचक खेल [इनमें से कई पेडों से जुडे हुए], वॉलीबॉल कोर्ट और नदी के पानी से भरा रहने वाला मौसमी स्विमिंग पूल है। ट्रीहाउस में गरमियों का मौसम बच्चों व परिवारों से भरा-पूरा रहता है। यह एक समर कैंप की तरह हो जाता है। लिहाजा रोमांटिक लोग ऑफ सीजन में आना पसंद करते हैं।
यहां के द स्वीट को इंजीनियरिंग का कमाल माना जाता है। स्कूलहाउस स्वीट पूरे सालभर खुला रहता है। भीतर से गरम रहता है और इसमें छह मेहमान ठहर सकते हैं। इसका अपना बाथरूम है, टब है। रसोई में फ्रिज है, माइक्रोवेव, कॉफी मेकर, टोस्टर, बर्तन और छह लोगों की जरूरत की सारी चीजें। इसी में एक मास्टर बेडरूम है, दो बच्चों के लिए अलग से लॉफ्ट और बैठकखाना भी। पूरा घर सरीखा और सब कुछ पेड पर। है न हैरत की बात। स्विस फैमिली कॉम्प्लेक्स मार्च से अक्टूीबर तक खुला रहता है। पीकॉक पर्च पूरे साल खुला रहता है। इस तरह के कई अनूठे ट्रीहाउस इस रिसॉर्ट में हैं। जैसे कि ट्रीजेबो 37 फुट की ऊंचाई पर सबसे ऊंचा ट्रीहाउस है। कुछ ऐसे ट्रीहाउस भी हैं जिनका रास्ता पूरी तरह सुरक्षित है फिर भी डर जाने वालों के लिए नहीं। एक ट्रीहाउस से दूसरे पर जाने के लिए कई झूलते रास्ते बने हुए हैं।
सबसे महंगे स्वीट यानी ट्री रूम स्कूलहाउस का एक दिन का किराया चार लोगों के लिए ढाई सौ डॉलर है। सारे किरायों में नाश्ता शामिल है। इसी तरह अलग-अलग ट्रीहाउस के लिए किराये दो सौ डॉलर से 120 डॉलर तक हैं। इन किरायों में ठहरने वाले लोगों की संख्या भी निर्धारित है। प्रत्येक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए 20 डॉलर देने होते हैं। जो लोग यहां ठहर नहीं सकते, वे इसे घूमने के लिए भी जा सकते हैं। अप्रैल से अक्टूबर तक हफ्ते में तीन दिन दिन में दो घंटे के लिए इस रिसॉर्ट की सैर की जा सकती है। इसके लिए किराया पांच डॉलर प्रति व्यक्ति है।
इसके अलावा कई तरह की अन्य गतिविधियां भी हैं जिनके लिए शुल्क देकर उनका मजा लिया जा सकता है। इनमें घुडसवारी व राफ्टिंग से लेकर आर्ट एंड क्राफ्ट तक सब शामिल है। लेकिन यहां अपने पालतू जानवरों को लेकर जाने की इजाजत नहीं है। सुरक्षा के लिहाज से तूफान के दिनों में या भारी हिमपात के दौरान इस रिसॉर्ट में ठहरने पर कुछ पाबंदियां लग जाती हैं।
इसे एक ट्रीहाउस वंडरलैंड कहा जा सकता है। यहां कुल 18 ट्रीहाउस हैं, सात झूलते पुल हैं, कई सीढियां, रस्सियां, प्लेटफार्म, और न जाने क्या-क्या हैं- पेडों पर बसी इस नगरी को चलाने के लिए। पूरा रिसॉर्ट 36 एकड इलाके में फैला हुआ है। पूरी तरह एक घरेलू उद्यम है। इसे बनाने के लिए कितनी मेहनत की गई होगी, यह यहां आकर ही समझा जा सकता है। लेकिन यह यकीनन ऐसी जगह है जिसका अनुभव अनूठा ही होगा। अगली बार यदि अमेरिका के ओरेगोन इलाके में जाएं तो यहां जाना न भूलें।
उपेंद्र स्वामी
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009
नक्सलियों का ह्रदय परिवर्तन सरकार के लिए चुनौती

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009
खबरों के प्रसारण पर नए दिशानिर्देश
दिशानिर्देशों का निर्धारण एनबीए प्राधिकार की एक बैठक में किया गया जिसकी अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे एस वर्मा ने की। दिशानिर्देशों में कहा गया है कि खबरों की रिपोर्टिग जनहित को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। इसके साथ ही परेशानी पैदा करने वाली स्थितियों की रिपोर्टिग में प्रसारकों को स्वविवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।
दिशानिर्देशों के अनुसार उन्हें आपरेशन के दौरान ऐसी गोपनीय सूचना का खुलासा नहीं करना चाहिए जिनसे राष्ट्रीय हित जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही षड्यंत्रकारियों के साक्षात्कारों का लाइव प्रसारण नहीं किया जाना चाहिए। परिशुद्धता पर जोर देते हुए नए नियमों में कहा गया है कि अगर संभव हो तो एक से अधिक स्रोतों से जानकारी जुटानी चाहिए। संवाद एजेंसियों से प्राप्त खबरों में उनका उल्लेख किया जाना चाहिए और संभव होने पर उसकी पुष्टि की जानी चाहिए।
इसके साथ ही नियमों में कहा गया है कि आरोपों को सही रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। तथ्यों में गड़बड़ी को जल्द से जल्द सुधार कर लेना चाहिए। संतुलित कवरेज पर जोर देते हुए नियमों में कहा गया है कि प्रसारकों को निष्पक्ष होना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विवादित विषयों से संबंधित खबरों में बिना किसी एक पक्ष को महत्व देते हुए विभिन्न विचार शामिल किए जाएं। नियमों में यह भी कहा गया है कि सामग्री के संपादन में प्रसारकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि घटनाओं की रिपोर्ट और तथ्यों में कोई छेड़छाड़ नहीं हो।
शादी गर दवा है तो..
दवा से कम नहीं है:
वैसे तो दुनिया की कोई किताब या इंसान यह ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि शादी आपके लिए सही है या नहीं? लेकिन अब वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि लंबी, स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी चाहिए तो शादी न करने की जिद छोड़ दें। बीते 150 ंवर्षो में हुए कई अध्ययनों में कहा जा चुका है कि शादीशुदा लोग कुंवारों के मुकाबले ज्यादा जीते हैं।
बड़े काम की चीज शादी :
शादी के कई फायदे हैं। यह बुढ़ापे में अकेलेपन से बचाती है। प्रतिदिन आपको अपने पसंदीदा व्यक्ति के साथ डिनर का मौका मिलता है। इसे कुंवारेपन का वैकल्पिक इलाज भी कहा जा सकता है। यह दवा खासतौर पर उन लोगों के लिए कारगर है जिन्हें उनका सच्चा प्यार मिल गया है।
ये तो अकेले ही भले :
शादी उन लोगों के लिए दवा नहीं है जिनका तलाक का मामला चल रहा है। जमीन-जायदाद और कानूनी झमेलों में फंसे लोग भी इससे दूर ही ही रहें तो बेहतर। अगर आपको लोगों से समन्वय बैठाने में दिक्कत आती है तो भी शादी से दूर ही रहें।
कुछ चेतावनियां और उपाय:
अगर आपको अंदाजा नहीं है कि शादी के बाद आप की प्रतिक्रिया क्या होगी तो इस दिशा में अपने कदम सोच-समझ कर ही उठाएं। शादी हो चुकी है तो जीवन साथी के साथ बातचीत में थोड़ी सावधानी बरतें। कई बार छोटी-छोटी बातें और गलत प्रतिक्रिया बड़े विवाद की वजह बन जाते हैं। आकड़े बताते हैं कि तलाक की सबसे बड़ी वजह मियां-बीवी के बीच मतभेद बनते हैं। और हां, शादी के बाद शराब से दूर ही रहें तो अच्छा।
शादी के साइड इफेक्ट :
हर दवा की तरह शादी के भी साइड इफेक्ट हैं। कई बार अजीबो-गरीब ख्याल परेशान करते हैं। आपको भूलने की बीमारी होने का अंदेशा हो सकता है। तो कुछ एक बार आत्महत्या के विचार भी आ सकते हैं। हालांकि इसके पीछे आपकी अपनी गलतियां ही जिम्मेदार होती हैं।
कुछ गंभीर मुद्दे:
अचानक आप खुद को जिम्मेदार और बड़ा महसूस करने लगेंगे। सेक्स में रुचि घट सकती है या दूसरी महिलाओं के प्रति आकर्षण बढ़ सकता है। शादी होगी तो बच्चे होंगे ही जो वाकई बड़ी जिम्मेदारी होते हैं।
गलतियों को नजरअंदाज करें:
खुशहाल शादी के लिए चाहिए कि आप आपसी लगाव को बनाए रखें। जहां तक हो सके एक दूसरे की गलतियों को नजरअंदाज करें।
आखिर में:
शादी लंबे, स्वस्थ और खुशहाल जीवन की सबसे सुरक्षित और प्रभावशाली दवा है। लंबे समय का साथ, आत्मसंतुष्टि, प्यार और विश्वास इसके अन्य फायदे हैं। हालांकि यह दवा किसके लिए कितनी फायदेमंद साबित होती है यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है।
.. जहां गढे़ जाते हैं भविष्य
लैंग्वेज कोर्स
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर ऐंड कल्चर स्टडीज के अंतर्गत प्रमुख लैंग्वेज कोर्स की पढाई के साथ-साथ रिसर्च की सुविधा भी मौजूद है। आइए, अब नजर डालते हैं, जेएनयू में उपलब्ध प्रमुख लैंग्वेज कोसरें पर..
बैचलर ऑफ आर्ट्स कोर्स (आनर्स) : पर्सियन, अरेबिक, चाइनीज, जेपनीज, कोरियन, फ्रेंच, जर्मनी, रशियन और स्पेनिश।
मॉस्टर ऑफ आर्ट्स कोर्स : इंग्लिश, लिंग्विस्टिक, उर्दू, हिन्दी,पर्सियन, अरेबिक, चाइनीज, जेपनीज, कोरियन, फ्रेंच, जर्मनी, रशियन और स्पेनिश।
पीएचडी/ एमफिल कोर्स : इंग्लिश, लिंग्विस्टिक, उर्दू, हिन्दी, पर्सियन, अरेबिक, चाइनीज, जेपनीज, कोरियन, फ्रेंच, जर्मनी, रशियन और हिन्दी ट्रांसलेशन। इसके अलावा, इटेलियन, मंगोलियन, पश्तो, पुर्तगाल और उर्दू भाषा में पार्ट-टाइम लैंग्वेज कोर्स भी उपलब्ध हैं।
नए सत्र की शुरुआत
जेएनयू में वर्ष 09-10 सत्र के लिए आवेदन प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है और विभिन्न कोर्स के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। वर्ष 09-10 सत्र में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा 15 से 18 मई, 2009 के बीच होगी। यहां संचालित होने वाले कोर्सो में एडमिशन के लिए आवेदन की अंतिम तारीख है-16 मार्च, 2009।
कैसे मिलेगी एंट्री
जेएनयू में एंट्री के लिए आपको एंट्रेंस एग्जामिनेशंस के दौर से गुजरना होगा। हालांकि कुछ कोर्सो में एडमिशन मौखिक परीक्षा के आधार पर भी होता है। खासकर लैंग्वेज कोर्स में एडमिशन लेने के लिए संबंधित भाषा पर आपकी अच्छी पकड होनी चाहिए। यदि आप बैचलर(आर्ट्स) कोर्स में एंट्री चाहते हैं, तो 10+2 परीक्षा में कम से कम 45 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण होना जरूरी है। वहीं यदि आप एमए कोर्स में प्रवेश के इच्छुक हैं, तो ग्रेजुएशन में संबंधित विषय में न्यूनतम 45 प्रतिशत अंक होने चाहिए।
लैंग्वेज में स्कोप
आज पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज में तब्दील हो चुकी है। इसलिए लैंग्वेज की जानकारी न केवल करियर के दृष्टिकोण से, बल्कि कम्युनिकेशन के लिहाज से भी बेहद जरूरी है। उदाहरण के तौर पर, यदि आप बॉन्जॉर (bonjour) सुनिए या कॉमेंट अलैजव्यूस (comment allezvous) कैसे हैं आप जैसे शब्दों से परिचित नहीं हैं, तो पेरिस या मेड्रिड जैसे शहरों में आपको लोगों से कम्युनिकेट करने में मुश्किल हो सकती है। इंडस्ट्री अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2010 तक ऑफशोर इंडस्ट्री में एक लाख 80 हजार फॉरेन लैंग्वेज एक्सपर्ट की जरूरत होगी। वैसे, यदि आप फॉरेन लैंग्वेज में एक्सपर्ट हैं, तो टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, कॉल सेंटर, मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स आदि में नौकरियां मिल सकती हैं। आइए अब पडताल करते हैं किन लैंग्वेज एक्सपर्ट की है डिमांड इन दिनों :
जेपनीज : भारत और जापान के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध दिन ब दिन मजबूत हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में जेपनीज भाषा के जानकारों की डिमांड लगातार बढती ही जा रही है। खासकर इंटरप्रिटेटर की मांग अधिक है, जो बिजनेस ग्रुप या ऑफिशियल डेलिगेट्स के साथ मिल कर काम करते हैं। वैसे, इनके लिए टूरिज्म, एयरलाइंस और हॉस्पिटैलिटी में तो बेहतर संभावनाएं हैं ही, साथ ही, यूनिवर्सिटीज और प्राइवेट इंस्टीटयूट में भी जेपनीज टीचर की अच्छी-खासी मांग है।
जर्मन : इन दिनों कॉमर्शियल क्लास में जर्मन लैंग्वेज इंटरप्रिटेटर की अच्छी डिमांड है। साथ ही, बीपीओ इंडस्ट्री को भी जर्मन बोलने वाले प्रोफेशनल्स की दरकार है। टूरिज्म, एयर लाइंस और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में ऐसे लोगों की जरूरत है, जो जर्मनी भाषा के जानकार हों।
चाइनीज : चाइनीज दुनिया की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण भाषा है। साथ ही, चीन ग्लोबल इकोनॉमी और पॉलिटिक्स में भी खास स्थान रखता है। हाल के वर्षो में भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध भी मधुर हुए हैं। ऐसी स्थिति में चाइनीज भाषा के जानकारों के लिए असीम संभावनाएं देखी जा रही हैं।
स्पेनिश : स्टूडेंट्स के बीच स्पेनिश लैंग्वेज का काफी क्रेज है। बीपीओ इंडस्ट्री में भी स्पेनिश जानने वालों की डिमांड बनी रहती है। इन भाषाओं के अलावा, कोरियन, फ्रेंच, रशियन आदि भाषाओं के जानकारों की भी मार्केट में अच्छी-खासी डिमांड है। इन भाषाओं के जानकारों को अच्छी सैलॅरी पैकेज भी मिलता है।
जेएनयू के अंतर्गत आने वाले स्कूल
स्कूल ऑफ आर्ट्स ऐंड एस्थेटिक्स
स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी
स्कूल ऑफ कम्प्यूटर ऐंड सिस्टम्स साइंसेज
स्कूल ऑफ एन्वायरनमेंटल साइंसेज
स्कूल ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी
स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज
स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर और कल्चर स्टडीज
स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज
स्कूल ऑफ फिजिकल साइंसेज
स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज
स्पेशल सेंटर्स
सेंटर्स फॉर द स्टडी ऑफ लॉ ऐंड गवर्नेंस
सेंटर्स फॉर मॉलिकुलर मेडिसिन
सेंटर फॉर संस्कृत स्टडीज
सेंटर फॉर इंटरनेशनल ट्रेड ऐंड डेवलॅपमेंट
संक्षिप्त परिचय
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
स्थापना : वर्ष 1969
चांसलर : प्रो. यशपाल
वाइस चांसलर : बी.बी.भट्टाचार्या
लोकेशन : नई दिल्ली
एफिलिएटेड : यूजीसी
वेबसाइट : www.jnu.ac.in
पॉपुलर हैं पीएचडी कोर्स
जेएनयू के लैंग्वेज कोर्स की अपनी एक अलग पहचान है। यहां केवल देशी ही नहीं, बल्कि विदेशी स्टूडेंट्स भी पढाई के लिए आते हैं। यहां के लैंग्वेज कोर्स की क्या है वैल्यू? हमने बात की जेएनयू में स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर ऐंड कल्चरल स्टडीज के डीन प्रो. शंकर बसु से। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश..
वर्तमान में भारतीय छात्रों के लिए लैंग्वेज कोर्स करना कितना फायदेमंद है?
वैश्वीकरण के कारण देश में मल्टीनेशनल कंपनियां बडेे पैमाने पर आई है, जिनमें ऐसे प्रोफेशनल्स की डिमांड बढी है, जो विदेशी भाषाओं का जानकार हों। इसके अलावा, नए-नए देशों से हमारे व्यापारिक रिश्ते भी फॉरेन लैग्वेंज को बढावा दिया है। यही वजह है कि सामान्य स्टूडेंट्स भी विदेशी भाषाओं के कोर्स के प्रति आकर्षित हुए हैं।
जेएनयू का लैंग्वेज कोर्स कितना पॉपुलर है?
यहां लैंग्वेज की पढाई वर्षो से चल रही है। वहीं अधिकतर यूनिवर्सिटीज ने हाल में ही लैंग्वेज प्रोग्राम की शुरुआत की है। हमारे यहां छात्रों को भाषा की गहन शिक्षा के अलावा, रिसर्च की बेहतर सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती है। जेएनयू से पास-आउट होने के बाद करियर विकल्पों की कमी नहीं है।
किस लैंग्वेज कोर्स की पॉपुलरिटी इन दिनों अधिक है?
फॉरेन लैंग्वेज में इन दिनों जेपनीज, कोरियन, चाइनीज आदि कोर्स स्टूडेंट्स के बीच काफी लोकप्रिय हैं, क्योंकि इन कोर्सो में करियर की संभावनाएं इन दिनों अधिक हैं, जबकि विदेश से आने वाले ज्यादातर छात्र अंग्रेजी और लिंग्विस्टिक कोर्स को तवज्जो देते हैं। वैसे, पिछले चार-पांच वर्षों में रशियन लैंग्वेज में भी अच्छी डिमांड देखी जा रही है।
किस लैंग्वेज कोर्स में स्टूडेंट्स पीएचडी करना अधिक पसंद करते हैं?
इन दिनों अधिकतर छात्र फॉरेन लैंग्वेज की अपेक्षा अंग्रेजी, हिन्दी के अलावा, अन्य भारतीय भाषाओं में पीएचडी कोर्स करते हैं। इसकी वजह यह है कि फॉरेन लैंग्वेज कोर्स में ज्यादातर छात्र एमए करने के बाद जॉब करने लग जाते हैं।
विदेशी छात्रों के बीच जेएनयू की लोकप्रियता की वजह क्या है?
विदेशी छात्र भारत में आकर हायर एजुकेशन इसलिए भी लेना चाहते हैं, क्योंकि यहां कोर्स फीस, लिविंग कॉस्ट आदि अन्य देशों के अपेक्षा काफी कम है। साथ ही, रिसर्च के लिए जेएनयू देश-विदेश में विख्यात है।
फॉरेन लैंग्वेज में करियर बनाने के लिए किस स्तर तक की पढाई जरूरी है?
फॉरेन लैंग्वेज में करियर बनाने के लिए फुल-टाइम कोर्स करना बेहद जरूरी है। कम से कम एमए तक पढाई करना बेहद जरूरी है। इसके बाद ही स्टूडेंट्स लैंग्वेज में बेहतर करियर बना सकते हैं।
रविवार, 8 फ़रवरी 2009
भाषा के विवाद पर छत्तीसगढ़ियों को खलनायक बनाने की कोशिश
हिन्दी और आंचलिक बोलियों के बीच अंतर संवाद विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन कुछ ऐसी ही आवाजें बुलंद हुई। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, छत्तीसगढी राजभाषा आयोग और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए रमेश नाथ मिश्र ने ने कहा कि दिल्ली सल्तनत का छत्तीसगढ़ में कभी शासन नहीं रहा। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की बोलियां सुरक्षित है। यहां मिले शिलालेखों में छत्तीसगढ़ी की समृध्दता दिखाई देती है। इसके अलावा सन् 1920-30 के तरम्यान में निकली विकास एवं उत्थान पत्रिका में हिन्दी भाषा के साथ छत्तीसगढ़ी देखा जा सकता है। पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने जेल से जब पत्रिका निकाली थी उसमें भी छत्तीसगढ़ी का स्थान था। इसके अलावा पंडित लोचनप्रसाद, खूबचन्द बघेल सहित दूसरे साहित्यकारों ने भी छत्तीसगढ़ी को आगे बढ़ाया। श्यामलाल चतुर्वेदी ने कहा कि जिस प्रकार हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समांजस्य बनाकर काम किया जा रहा है वह अनुकरणीय है। छत्तीसगढ़ी की समृध्दता को समझने के लिए पांडू लिपियों को सामने लाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ी राजभाषा के आगे बढ़ने से हिन्दी को कोई नुकसान नहीं होगा। छत्तीसगढ़ी में आंचलिक बोलियों के शब्दों का समावेश किया गया है। इससे किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए । भाषा के विकास के लिए व्यक्तिवादी और राजनीतिक पूर्वाग्रहों को भूलकर काम करने की जरूरत है। बिहारीलाल साहू ने कहा कि किसी भी समाज में भाषा व भूमि को मां का दर्जा दिया जाता है। हिन्दी से छत्तीसगढ़ी राजभाषा का घुला हुआ संबंध है। हिन्दी अनेक भाषाओं का गुच्छा है। जिसमें छत्तीसगढ़ी भी शामिल है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ी का स्वरूप भिन्न है। उन्होंने कहा कि इसका प्रमुख कारण क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल से जोड़कर देखा जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बस्तर और सरगुजा दोनों क्षेत्रों में कई बोलियां हैं। आंचलिक बोलियों के नाम पर छत्तीसगढ़ियों को बांटने की कोशिश न की जाये। भाषा व्यवहार से समृध्द होती जाती है। राजभाषा को किसी सियासी फरमान से मजबूत नहीं किया जा सकता। इसे स्वतंत्र तरीके से व्यवहार में लाना पड़ेगा। संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए नंदकिशोर तिवारी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी पत्रिकाओं को दोयम दर्जे में रखा जाता है और छत्तीसगढियों को आपस में लड़ाने की कोशिश की जाती है। दुभार्ग्य की बात है कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा गया कि किसी भी राजभाषा को संविधान के आठवें अनुसूची में शामिल न किया जाये। व्यास नारायण दुबे ने कहा कि छत्तीसगढ़ी राजभाषा में 22 आंचलिक बोलियों को शामिल किया गया है।भाषा और विचार दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। श्री अशोक ने कहा कि भाषा की मौलिकता को मारने की कोशिश की जा रही है। सन् 2002 में राजनांदगांव में आयोजित साहित्य सम्मेलन में छत्तीसगढ़ी भाषा को आत्मा की संज्ञा दी गई थी। ऐसी भावुकता से बचने की जरूरत है। भाषा और बोली आत्मा नहीं होती बल्कि आत्मा तो संस्कृति होती है। उन्होंने भाषा की मानकीकरण पर जोर देते हुए कहा कि इसके बिना किसी भी भाषा का ढाचा नहीं बन सकता। भाषा और बोलियों के बीच छत्तीसगढ़ियों को आपस में लड़ाने से पहले सोच लेना चाहिए कि यहां के लोग कभी भी खलनायक नहीं बन सकते। छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच के उपसंयोजक जगेश्वर साहू ने कहा कि सरकार और प्रशासन में बैठे लोग भाषा के नाम पर लड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में हिन्दी और गैरछत्तीसगढ़ी लोग शासन प्रशासन में बैठे हुए हैं। उन्हें समझ लेना चाहिए कि सामाजिक समरसता और सभी कला संस्कृतियों को यहां सम्मान मिलता है। छत्तीसगढ़ के लोगों के साथ ही छत्तीसगढ़ी राजभाषा बोलने वालों के साथ न्याय की जरूरत है और इसके लिए नजरिया बदलना चाहिए । इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति बिगड़ सकती है क्योंकि अब छत्तीसगढ़ के भोले-भाले समझे जाने वाले लोग भी अपने सम्मान के लिए जीने लगे हैं। छत्तीसगढ़ी बोली को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया लेकिन यह कामकाज का भाषा कैसे बने इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। सरकार के ठेकेदारों को चाहिए कि अब वे राष्ट्रीय भाषा और राज्य भाषा में छत्तीसगढ़ी को सम्मान दिलायें। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय नेता पूरे देश को एक नजर से देखें और क्षेत्रवाद की राजनीति न होने दें। भले ही कार्यक्षेत्र क्षेत्रीय हो लेकिन भावना हमेशा राष्ट्रीय होना चाहिए । जगेश्वर साहू ने कहा कि विधानसभा में छत्तीसगढ़ी राजभाषा का प्रयोग करने के लिए शपथ लेने जब विधायकों की बारी आई तो कुछ ही विधायक शपथ लिये। छत्तीसगढ़ के लोग हमेशा से दगाबाजी सहते आये हैं। अब बर्दास्त नहीं किया जायेगा।
.... तॊ भारतीय भाषाओं को भगवान भी नहीं बचा सकते
कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, छत्तीसगढी राजभाषा आयोग और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के संयुक्त तत्वाधान में हिन्दी और आंचलिक बोलियों के बीच अंतर संवाद विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सीएनईबी चैनल के प्रमुख राहुल देव ने कहा कि समाज व देश की सम्प्रभुता के लिए एक भाषा की जरूरत होती है और उसी से खुद को देखना और समझना चाहिए। वर्तमान में भारतीय भाषाओं पर नहीं बल्कि भारतीयता पर संकट दिखाई दे रही है। भारत शब्द भी हिन्दी से धीरे-धीरे बाहर होता जा रहा है। भाषा को यंत्र या उपकरण माना जा रहा है,भाषा को माध्यम मानना भी किसी मूर्खता से कम नही है। भाषा को गंभीरता से लेने की जरूरत है। बदलती भाषा से मन बदलता है यही कारण है कि देश अपनी नजर से खुद को देखना भूल गया है। उन्होने कहा कि संकर भाषा जरूरी है, लेकिन भाषा को भ्रष्ट किया जाना घातक है। राहुल देव ने हिन्दी भाषा में अनावश्यक अंग्रेजी के प्रयोग पर चिंता जाहिर की और कहा कि वे अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं करते लेकिन जो स्थिति है ,वह हिन्दी के लिए नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं के लिए खतरनाक है।
वरिष्ठ पत्रकार राहुलदेव ने कहा कि सरकार देश को सन् 2050 तक महाशक्ति बनाना चाहती है और इसके लिए वह कक्षा एक से ही अंग्रेजी की शिक्षा अनिवार्य कर रही है। देश के 20 रायों में प्राथमिक शिक्षा के साथ ही अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हो गई है । ऐसे में सन् 2050 तक हिन्दी भाषा ही नहीं बल्कि किसी भी भारतीय भाषा के अस्तित्व को बचाना आसान नहीं होगा। उन्होंने हिन्दी मीडिया पर भी खुलकर कटाक्ष किया और कहा कि हिन्दी मीडिया हिन्दी भाषा की हत्या कर रही है।
वरिष्ठ पत्रकार एवं नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव ने कहा कि पत्रकारों के सामने सम्प्रेषण की समस्या दिखाई दे रही है। पैंतीस सौ अंग्रेजी के शब्द हिन्दी में है। हालांकि वर्तमान में अंग्रेजी के शब्दों का अनावश्यक प्रयोग हो रहा है। अखबार अंग्रेजी के शब्दों को जबरन ठूंस रहे हैं। एक-दूसरे भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए लेकिन फैशन के कारण ऐसा होना गंभीर है।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए लेखक एवं पत्रकार रमेश नैय्यर ने कहा कि भाषा में परिवर्तन आने से संस्कृति में भी उसका प्रभाव दिखाई देता है। देश में हिन्दी को विस्थापित करने का षड़यंत्र चल रहा है जो चिंता का विषय है। अंग्रेजी से कोई परहेज नहीं है लेकिन साम्रायवाद को समझने की जरूरत है। अगर हमें भारतीय अस्मिता का ख्याल है तो लोक भाषाओं के शब्दों के प्रयोग को गलत नहीं मानना चाहिए। भाषाओं के द्वार खुले रखने की जरूरत है।साहित्यकार डॉ सुशील त्रिवेदी ने कहा कि हिन्दी ही नहीं बल्कि दूसरी भाषाओं पर भी उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण के कारण संकट है। सामाजिक अवधारणा भी बदल गई है पहले जैसे रिश्ते थे अब वैसा नहीं, अब सिर्फ निकट का ही रिश्ता रह गया है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी में मौलिक सोच को लाने में काफी देर हुआ। यह भी वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
दीनदयाल मानव अध्ययन शोध पीठ के अध्यक्ष रमाशंकर अगि्होत्री ने कहा कि साहित्य ने साहित्यकारों को पत्रकारिता से अलग कर दिया है। साहित्य वर्तमान में लक्ष्य की तलाश नहीं कर पा रहा है और ऐसे साहित्यकारों की फाौ बढ़ी है। साहित्य अपना परिचय भी भूल गया है और परिचय बताने वालों को साहित्यकारों ने भूला दिया है। साहित्य जगत में पत्रकारों को अभिष्ठान दिलाने की जरूरत है।
लेखक एवं साहित्यकार इंदिरा मिश्रा ने कहा कि हिन्दी अखबारों में हिग्ंलिस का प्रयोग हो रहा है। संपादकों को ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि अरबी और फारसी के सात हजार हिन्दी कोष में है। दूसरे भाषाओं के शब्दों को लेकर भाषा समृध्द होती है। हिन्दी से आंचलिकता प्रभावित हुई है और आंचलिकता ने हिन्दी को प्रभावित किया है।
हिन्दी लेखक निरंजन महावर ने कहा कि हिन्दी किताब पढ़ने और खरीदने वालों की संख्या कम हुई है। सम्प्रदायिक सोच ने हिन्दी को संर्कीण बना दिया है। हिन्दी अब लोचदार और मुहावरेदार भाषा नहीं रह गई है। आंचलिक बोलियों की तरफ झुकाव बढ़ा है। आंचलिक बोलियों के मुहावरों का प्रयोग हिन्दी में करने से कोई संकोच नहीं करते। यही सब कारण है कि हिन्दी की सम्प्रेषण शक्ति कम हुई है।
संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक गिरीश पंकज ने कहा कि भाषाओं के बीच शब्दों का आदान प्रदान हो ,लेकिन संस्कृति नष्ट न हो, इस पर चिंतन की जरूरत है। हिन्दी के प्रति यहीं नजरिया रहा तो भाषा हासिये में चली जायेगी। हिन्दी पत्रकारिता में भी हिन्दी को तबाह किया है जिसे आने वाले पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी । वैश्विक होने की ललक हमसे अपनी भाषा को छीन रही है और धीरे-धीरे उसका जड़ कटता जा रहा है।प्रस्तुतकर्ता दिलीप जायसवाल
शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009
कागजो में संरक्षण, पुरात्ताविक स्थलों और स्मारकों की सुरक्षा खतरे में

पुरात्ताविक स्थलों की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा अभी तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया जा सका है। यह जरूर है जब सिरपुर, कान्केर,बिलासपुर,अम्बिकापुर , मल्हार से मूर्तियों की चोरी शुरू हुई और पता चला कि इसमें अंतर्रायीय गिरोह शामिल है तो पुलिस सक्रिय हुई । इन घटनाओं के बाद माना जा रह था कि सरकारी नुमाईदें गंभीर होंगे लेकिन ऐसी स्थिति दिखाई नहीं दी है। जब 59 स्मारकों की सुरक्षा का जिम्मा पुरातत्व विभाग ने लिया तब तक डेढ़ दर्जन मूर्तियों की चोरी हो चुकी थी । इनमें से कुछ मूर्तियां तो मिल गई लेकिन शेष मूर्तियों का कोई पता नही चला। सुरक्षा के लिए विभाग द्वारा हर साल 30 लाख रूपए खर्च करने की योजना बनाई गई है।सुरक्षा के लिए 22 केयरटेकरों तथा 68 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ये कर्मी सुरक्षा की दृष्टि से सफल नहीं दिखाई दे रहे हैं।
सिरपुर की बात करें तो यहां की सुरक्षा भगवान भरोसे है। यह जरूर है कि लक्ष्मण मंदिर से मूर्ति चोरी होने के बाद सर्तकता बरती जा रही है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि सिरपुर स्थित पुरात्ताविक स्मारक कई स्थानों में दूर-दूर पर है । इसके कारण सुरक्षा कर्मी भी मानते हैं कि दिन में तो किसी तरह वे संभाल लेते है लेकिन रात में पूरी सुरक्षा संभव नहीं होती । सूत्रों की माने तो मूर्तियों का चोर गिरोह अभी भी सक्रिय है और उसकी नजर सिरपुर में खुदाई से निकले प्राचीन बेस कीमती मूर्तियों पर है। चोर गिरोह की सक्रियता खुदाई में मिले बौध्द स्तुप के बाद और भी बढ़ गई है। आसपास के लोगों की बात माने तो यहां से कई मूर्तियां चोरी हुई हैं लेकिन वे सरकारी फाईलों में दर्ज नहीं हुए हैं। यहां रेस्टहाऊस के पास स्थित पुरात्ताविक स्मारक की सुरक्षा के नाम पर लगे लोहे के ग्रील को फांदकर कोई भी अंदर जा सकता है। इसकी सुरक्षा मध्यप्रदेश जमाने के पुरात्तत्व विभाग का एक बोर्ड कर रहा है। सिरपुर के पुरात्ताविक स्मारकों को सुरक्षित कर पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने 70 लाख रूपए की मंजूरी मिल चुकी है। इसके तहत पुरात्ताविक संग्राहल का निर्माण किया जायेगा। गौरतलब है कि सिरपुर में पहली खुदाई सन् 1953-54 में सागर विश्वविद्यालय के पुरातत्व विद डॉक्टर एम.पी.दीक्षित के नेतृत्व में हुआ था वहीं अभी पिछले तीन वर्षो में 32 टीलों की खुदाई हुई है।बताना लाजिमी होगा की सुरक्षा का अभाव होने के कारण यहां की खुदाई के लिए पुरातत्वविद्वो द्वारा अनुमति नहीं दी जा रही थी । अब जब खुदाई चल रही है इसके बाद भी सुरक्षा पर कई प्रकार के सवाल उठने लगे हैं।
राज्य के उत्तर में स्थित सरगुजा जिले के डीपाडीह में कल्चुरी काल की सैकड़ों मूर्तियां बिखरी हुई पड़ी है। वहीं महेशपुर,देवगढ़ की मूर्तियों की सुरक्षा व संरक्षण भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। महेशपुर में शिव मंदिरों का भगन्नावेश भी असुरक्षित है । देवगढ़ की मूर्तियों को स्थानीय कलाकारों द्वारा विकृत किया जा रहा है। वहीं सरगुजा में ही स्थित जोगीमारा में मिले शैलचित्र लगातार नष्ट हो रहे हैं। रामगढ़ से कई मूर्तियां चोरी हो चुकी हैं। कईयों की रिपोर्ट भी पुलिस के पास नहीं है उसके बाद भी ना तो स्थानीय प्रशासन और न ही सरकार इस दिशा में गंभीरता से पहल कर रही है। सरगुजा प्रशासन ने डीपाडीह तथा दूसरे स्थलों से लाकर जिला मुख्यालय अंबिकापुर में दर्जनों मूर्तियों को कलाकेन्द्र में संरक्षित करने का प्रयास किया था लेकिन यहां से मूर्तियां गायब हो गई । यही नहीं अब तो कलाकेन्द्र का आस्तित्व ही खत्म हो गया है।
सिर्फ पर्यटन के विकास और कागजों में संरक्षण की बात करने से ही ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रख पाना आसान नहीं दिखता। सरकार को पुरात्ताविक स्मारको तथा स्थलों की सुरक्षा के लिए गंभीरता से कदम उठाने की जरूरत है नहीं तो छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक गाथा को समेट कर रख पाना सहज नहीं होगा।
प्रस्तुतकर्ता दिलीप जायसवाल
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
औद्योगिक विकास बना अभिशाप, हवा और पानी में जहर
शनिवार, 24 जनवरी 2009
सरगुजा में नक्सलियों से ज्यादा आतंक हाथियों का ,सैकड़ों परिवारों का आशियाना उजड़ा
जंगली हाथियों की तबाही से डरे-सहमे लोग अपनी जान बचाने रतजगा कर रहे हैं। गांव के स्कूल भवन एवं पंचायत भवन में अपनी रातें गुजार रहे हैं। एक तरफ हड्डियां कंपा देने वाली ठंड दूसरी तरफ मौत का खौफ देखते ग्रामीण अपने बच्चों को बचाने बेबस नजरों से रहनुमाओं की खोजकर रहे हैं। गाड़ियों से उतरकर तबाहियों के आकलन के लिए आने वाले अधिकारियों की तरफ ये बेबस इंसान रोज नई आशाओं का भ्रम पाल कर रातें गुजार रहे हैं। अधिकारी उन्हें हाथियों से दूर रहने का पुराना जुमला पढ़ाकर विदा हो लेते हैं। इतनी बड़ी समस्या में रातें गुजारने वालों की तस्वीर शायद हमारी सरकार या राजनेताओं तक नहीं पहुंच सकी है या पहुंची है तो राजनेता और सरकार इस मामले के प्रति गंभीर नहीं हो रहे हैं। बरवादियों से उजड़े परिवार को मुआवजा का मसाला चटाकर यथा स्थिति में सब के जीने का अधिकार कायम रहे इस सोच से अलग कुछ नहीं हो सका है। स्थिति को देखकर लगता है कि समस्या के निराकरण में बरबादियों के बदले मुआवजा देने से अधिक कुछ भी नहीं हो सकता। दो दशकों से बरबादी की कहानी से साक्षी इस जिले के ग्रामीणों की चिंता इसके जनप्रतिनिधियों से लेकर राज्य सरकार तक को नहीं है अन्यथा कोई तो पूछ-परख करता। मुआवजा देने से अलग स्थाई हल की बात सुझाता। आश्चर्यजनक है कि राज्य की विधानसभा में जनप्रतिनिधियों ने अपने प्रश्नों में प्रभावित के मुआवजे से अलग इस सम्बन्ध में कुछ विशेष नहीं जानना चाहा है। उन्होंने अपने क्षेत्र में मुआवजा वितरण की बात को प्रमुखता से उठाया है। ग्लोबल टाइगर फोरम के महासचिव एवं हाथी परियोजना के पूर्व निदेशक एस.सी.डे के अनुसार 1989 में वन्य जीव संस्थान देहरादूर में आयोजित सेमिनार में यह जानकारी दी गई थी। सिंहभूमि के वेतला राष्ट्रीय उद्यान से जंगली हाथी विस्थापित होकर पश्चिम बंगाल के मिदानापुर एवं सरगुजा जंगलों में आए थे। श्री डे ने बताया कि उनके अध्ययन में सत्तर साल के अंतराल में हाथी नहीं आए हैं। अस्सी के दशक में पहली बार हाथी पहली बार सरगुजा आए। उनकी नजर में इस समस्या का हल आवश्यक है जो दृढ्ता से लेना होगा। इस हल में जनता, जनप्रतिनिधि, सरकार की सहमति से ही हल निकाला जा सकता है जो अत्यंत मालूम पड़ता है। क्षेत्र के किसी बड़े सुरक्षित वनखण्ड में हाथियों के बड़े दल को रखने की योजना बनाई जा सकती है। छोटे दलों में बंटे हाथियों को खदेड़कर या फिर पकड़कर इस समस्या का हल ढूंढा जा सकता है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नजर नहीं आता। हाथियों को पकड़ने के लिए कर्नाटक सरकार से ही मदद मिल सकेगी क्योंकि कर्नाटक में ही हाथियों के विशेषज्ञ हैं। कनार्टक सरकार से हाथियों को पकड़ने विशेषज्ञों की मांग प्रदेश एवं केन्द्र सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति पर ही निर्भर करेगा। हाथियों के पकड़ने पर अत्यधिक व्यय आने की सम्भावना है। उन्होंने बताया कि 1993 में एक हाथी को पकड़ने में 85 से 90 हजार रूपये का खर्च आया था, जो आज की स्थिति में पांच से छह लाख रूपये हो सकती है वह भी तब जब कर्नाटक से विशेषज्ञ उपलब्ध हो जाएं।हाथियों का उपयोगराजघरानों के ध्वस्त होने के बाद हाथी पालने का शौक जमींदारों ने पाल लिया। हाथी से उनके समृद्धि की पहचान उनके इलाके में होती थी, लेकिन आज हाथियों के ऊपर बढ़ते खर्च के आगे सबने हाथ उठा लिए। नये दौर में यह न तो शौक का सवारी रहा न समृद्धि की पहचान। नये दौर में हाथी-हाथी पालने का जुमलाभर रह गया है। आज हाथियों का उपयोग पर्यटन, अभ्यारण्यों की चौकसी एवं लकड़ी से जुड़े कारोबार में ही किया जा सकता है। देश में आज इनकी संख्या 28 से 30 हजार है, जबकि 1980 में इनकी जनसंख्या 12 हजार थी। सोनपुर मेले में 1965 में 5 हजार में बिनके वाले हाथी की कीमत बढ़कर आज पांच से छह लाख हो गई है। सिंहभूम में अभ्यारण्य के किनारे खुले खदानों से निकलने वाले पानी के जहरीले प्रभाव से हाथियों के बच्चे मरने लगे। इससे हाथियों ने अपने लिए सुरक्षित स्थान की खोज में अन्यत्र पलायन किया। पलायन स्थलों में वे अपने को सुरक्षित महसूस करने लगे। यही कारण है कि यह स्थान उका स्थाई निवास बनने लगा।
सरगुजा नामकरण में हाथियों का हाथ सरगुजा के नामकरण के पीछे हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इससे ऐसा भान होता है कि सरगुजा में भारी तादाद में हाथियों की उपस्थिति रही होगी। सरगुजा शब्द सुरगज, सरगजा या स्वर गजा का विकृत रूप हो सकता है। सुरगज- जहां इन्द्रदेव के हाथी ऐरावत जैसे हाथी पाए जाते हों। सरगजा- जहां हाथियों के विशालकाय सिर ही सिर दिखते हों। स्वरगजा- जहां हाथियों का स्वर चिंघाड़ गुजता रहता हो। इस प्रकार सरगुजा नाम की व्युत्पत्ति इन शब्दों से विकृत होकर हो सकती है। ऐसी किंवदली है कि सरगुजा के जंगलों में कभी विशालकाय हाथी होते थे, जो देवराज इन्द्र के हाथी ऐरावत के सदृश्य विशाल ललाट पर सफेद चिन्ह लिए पैदा होते थे। जिले के ऐतिहासिक स्थल जिले के रामगढ़ का सम्बन्ध कालीदास के मेघदूत के नायक यक्ष से जोड़ा जाता है। इंद्र के हाथी ऐरावत ने कुबेर का बाग उजाड़ दिया था और बाग के रक्षक यक्ष को इस दण्ड स्वरूप अकेले रामगढ़ में प्रवास करना पड़ा।
शनिवार, 13 दिसंबर 2008
गद्दार नेताओं को सबक सिखायेगी युवा शक्ति, सांसद भूले शहीदों को
दुनिया में ऐसे कम ही लोग होते है जो अपना जान बचाने वाले को भूल जाते है। इन्ही में हमारे देश के सांसद भी शामिल हो गये है। आज 13 दिसम्बर को संसद में हमले का सात साल पूरा हुआ। हमले में शहीद हुए जवानों को श्रध्दांजलि देने के लिए आठ सौ सांसदों में महज बीस सांसद ही पहुंचे। दुर्भाग्य की बात है कि इनमें देश के गृह मंत्री, विदेश मंत्री भी शामिल है। अगर ये जवान उस दिन आतंकियो से मुकाबला नहीं किये होते तो सांसदो को बंधक बना लिया गया होता और आतंकी अपनी मांग पूरी कराये होते। यह भी कोई बड़ी बात नहीं थी कि सभी सांसदो को मौत के घाट उतार दिया जाता। शायद जैसे-जैसे यह घटना पुरानी होती गई सांसद शहीद जवानों को भुल गये और सिर्फ इस हमले के बाद फांसी की सजा पाने के बाद जेल में बंद अफजल पर राजनीति करना ही याद रह गया है। देश के नेता कितने गद्दार होते जा रहे हैं वह इसी बात से समझा जा सकता है कि संसद के दो कर्मचारी भी शहीद हो गये थे लेकिन उनके परिवार के लोग मदद की दरकार लिये दर-दर की ठोकरे खा रहे है। आज जब श्रध्दांजलि के नाम पर मुठ्ठी भर सांसद मौके पर पहुंचे थे तो वहां भी वे पहुंचे थे। लेकिन वहां उनकी बात मीडिया के अलावा किसी ने नहीं सुनी । पिछले महीने हुए मुम्बई हमले की घटना के बाद भी देश के नेताओं का असली चेहरा हर किसी ने देखा। इसके बाद भी ये अपने को नहीं बदल सके। शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि कुत्ते का पुंछ कभी सीधा नहीं होता। हालात देखकर तो लगता है अगर सुभाष चन्द्र बोस जैसे देश भक्त आज अगर होते तो आजाद कहे जाने वाले भारत के इन नेताओं को सबक सिखाने से पीछे नहीं हटते। अभी भी वक्त है ऐसे नेताओं को सबक सिखाया जाये और खुद देश के लिए शहीद होने वाले जबांजो को अपना आदर्श बनाया जाये। देश की युवा शक्ति को आगे आने की जरुरत है और उसे इन नेताओं से भी सतर्क रहने की जरुरत है जो मंचो से भले ही उन्हें एक नई मंजिल की रोशनी दिखाते हैं। लेकिन लोकतंत्र के उत्सवों के दौरान इन युवाओं का किस प्रकार उपयोग होता है। अभी भी वक्त है हम संभल जाये वरना कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं होगा।
रविवार, 30 नवंबर 2008
बालको ने शिमला में घोला जहर, भूखे-नंगे आदिवासी बन रहे पहचान
छत्तीसगढ का शिमला कहे जाने वाले मैनपाट की प्राकृतिक वादियों में लगातार एक ऐसा जहर घुल रहा है जो इस शिमला के अस्तित्व के लिए कभी संकट बन सकता है। बॉक्साईट खादानों में होने वाले विस्फोटों के कारण प्रदूषण की समस्या तो वहीं जहां-तहां अवैध उत्खनन के कारण प्राकृतिक सुंदरता पर ग्रहण लग गया है। यहां के आदिवासियों के पास दो वक्त की रोटी बात तो दूर इस कड़कडाती ठण्ड में तन पर लपेटने के लिए ठीक से कपड़े तक नसीब नहीं हो रहा है।
सरकार द्वारा मैनपाट को पर्यटन के दृष्टि से विकसित करने प्रयास किया जा रहा है। पर्यटकों के रूकने के लिए होटल बनाया जा रहा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी यहां की प्राकृतिक सौंदर्य को बचाने की कोशिश नहीं की जा रही है। सबसे बड़ी बात है कि यहां 15 साल से बालकों द्वारा बॉक्साईट का उत्खनन किया जा रहा है। बालकों ने उत्खनन के लिए हजारों पेड़ों की बली चढ़ा दी। लेकिन इस कंपनी ने इन 15 सालों में एक भी पेड़ तैयार नहीं किया है। जांच में बालको को दोषी भी पाया गया लेकिन अर्थदण्ड के अलावा प्रशासन ने जिम्मेदार प्रबंधन के अधिकारियों के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं कराया । बॉक्साईट के खदानों में उत्खनन के लिए नियम कानून को ताक पर रखकर विस्फोट किये जा रहे है और प्रदूषण की समस्या बढ़ गई है लेकिन सरकार गंभीर नहीं है। अब तक बालको के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति ही हुई है। जानकारी के अनुसार बालको को आईबीएम (इंडियन ब्यूरो माइंस) तथा पर्यावरण विभाग ने मैनपाट की प्राकृतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए बॉक्साईट उत्खनन करने का लाइसेंस दिया था लेकिन इसे नजरअंदाज कर बालको तीन साल से अवैध उत्खनन करती रही। इसकी जांच आईबीएम को करनी थी लेकिन इस पर भी खानापूर्ति कर ली गई। इस मामले में बालको के साथ ही कलेक्टर भी कटघरे पर दिखे थे आईबीएम ने खुद रास्ता साफ कर दिया । बताया तो यह भी जाता है कि इसमें आईबीएम के एक बड़े की मिलीभगत थी। इसके लिए बालको को लाखों का भेंट देना पड़ा। यह मामला मैनपाट की प्राकृतिक वातावरण पर हमले से जुड़ा हुआ था। इसके बाद भी प्राकृतिक संपदा और उसकी सुरक्षा का दंफ भरने वाले संगठन चुप्पी साधे हुए हैं।
बालकों ने जहां मैनपाट की प्राकृतिक संतुलन को तहस-नहस करना शुरु कर दिया है वहीं खदानों में काम करने वाले हजारों मजदूरों को सुअरों के लिए बनाये गये बाड़े जैसे झोपड़ियों में रहना पड़ रहा है। बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे है। खदानों में तीन हजार से अधिक मजदूर काम कर रहे है और बालको प्रबंधन द्वारा मजदूरों की हित में हर साल लाखों रूपये खर्च करने का दावा किया जाता है पर सच्चाई को छुपाया नहीं जा सकता है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य की बात क्या हो सकती है कि खदानों में कई बार बच्चे भी काम करने के लिए मजबूर दिखाई देते है। बालको प्रबंधन द्वारा हमेशा से छला जा रहा है। मजदूरों का कहना है कि जब भी आंदोलन करते है तो उन्हें आश्वासन मिलता है लेकिन अब उम्मीदें नहीं है। बालको की इस रवैये का फायदा यहां के मजदूर संगठन और नेता उठाते रहे हैं। अब तो यहां तक कहा जाने लगा है कि जब मजदूर नेताओं का जेब खाली हो जाता है तो वे आंदोलन के लिए मजदूरों को उकसाते है और ऐसा आंदोलन हर माह दो माह में चलता ही रहता है। यह बताना लाजमी होगा कि मजदूर इन तथाकथित नेताओं के दलाली का शिकार हो रहे है। जब तक इन मजदूरों को सही नेता नहीं मिलेगा तब तक बालको प्रबंधन इनका शोषण करता ही रहेगा। कई बार ऐसी भी स्थिति बनती है जब मजदूरों के दिल में बालको प्रबंधन के खिलाफ विरोध की वाला भड़कती है तो वह भी दबकर रह जाती है क्योंकि मजदूर यादा दिनों तक विरोध करेंगे तो दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पायेगी। वहीं सरकार को तो बालको से यादा से यादा राजस्व चाहिए उसे मजदूरों की कराह सुनने की फुर्सत ही कहां है? मैनपाट के वातावरण में घुल रहे जहर का घातक परिणाम कभी भी भयावह हो सकता है और इसे यहां के रहने वाले माझी जनजाति को जूझना पड़ेगा। जब यहां बॉक्साईट की खदानें खुली तो आदिवासियों को सुखद अनुभूति हुई थी। लेकिन अब तो उनकी समाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित बचाये रखना मुश्किल हो गया है।
मैनपाट के बदले हालात का अंदाजा पहली बार में नहीं लगा सकता आज से दस साल पहले जो मैनपाट गया होगा वह अब जाकर वहां की बदहाली को समझ सकता है। छत्तीसगढ़ के इस अभागे शिमला में रायपाल से ही कई नेता मंत्री हमेशा जाते रहे है। शायद उन्हें यहां के भूखे, नंगे आदिवासियों को देखकर खुशी होती है और वे इसी को आदिवासियों की पहचान मानते हैं। नये साल में बड़े-बडे अधिकारी मौज-मस्ती के लिए पहुंचते है। पिछले साल भी अधिकारी मौज-मस्ती के लिए पहुंचे थे जहां बच्चों ने उनके कप-प्लेट धोये थे और जूठा खाया था। अब नया साल आने वाला है ऐसे में ऐसा फिर हो तो कोई बड़ी बात नहीं। वैसे भी अब तो यहां यह रोज की बात हो गई है।
बालको द्वारा यहां से हर रोज सैकड़ों मिट्रिक टन बॉक्साईट का उत्खनन कर परिवहन किया जा रहा है। ओवरलोड की शिकायत आम रही है। इससे यहां की सड़क खस्ताहाल हो चुका है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए यह किसी खतरे से कम भी नहीं है लेकिन बड़ी बात तो यह भी है कि नेता मंत्रियों पर पहुंच रखने के कारण प्रशासन का आदेश भी बेअसर साबित होता है। सरगुजा कलेक्टर ने बालको प्रबंधन को जर्जर सड़क को बनाने कई बार निर्देश दिये लेकिन प्रबंधन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
सवाल यह उठता है कि अगर बालको ने ईमानदारी से मैनपाट के विकास के लिए काम किया होता तो मैनपाट के सपूतों को जूठे प्लेट और जूठन नहीं खाना पड़ता। शायद यही कारण है कि जशपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जुदेव वहां बॉक्साईट का विशाल भंडार होने के बाद भी उत्खनन का विरोध करते रहे है। जब भी उनसे बॉक्साईट उत्खनन के विरोध का कारण पूछा जाता है तो उनका एक ही विचारणीय जवाब होता है कि आप मैनपाट और रायगढ़ की हालत नहीं देख रहे हैं। हम जशपुर को बदहाल नहीं बनना चाहते। श्री जुदेव का यह भी कहना है कि उद्योगों को बढ़ावा देने की जगह उसी धरती पर कृषि को उद्योग से क्यों नहीं जोड़ा जाता। चाहे जो भी हो मैनपाट का दर्द सुनने वाला कोई भी नहीं है और इस शिमला के आदिवासी प्राकृतिक संपदाओं के दोहन के बाद भी बदहाली के बीच जीने को मजबूर है। वे अपनी प्रकृति की सुरक्षा करने में बेबस और लाचार दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में जरुरत है एक ऐसे मसीहा की जो फिर से लौटा सके यहां की आबो हवा में पसीना बहाने वालों की जिंदगी में खुशहाली ताकि पर्यटकों की तरह मुस्कुराता रहे मैनपाट।
प्रस्तुतकर्ता- दिलीप जायसवाल
बुधवार, 19 नवंबर 2008
गरीबी की मार, सजा सूअर का कच्चा मांस
रायपुर में रईसों की कमी नहीं है । इनके बीच एक ऐसा वर्ग भी है जिसके पास न तो रहने के लिए घर है और न ही बच्चों का पेट भरने के लिए अनाज । यह जरूर है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा तीन रूपये किलों में चांवल दिया जा रहा है। रिंग रोड़ स्थित न्यू राजेन्द्र नगर के बजाज कॉलोनी के बाजू में रहने वाले झुग्गी झोपड़ी निवासी ठाकुर राम पटेल के चार बच्चे हैं और उसकी पत्नी गर्भवती है। विधानसभा चुनाव के एक दिन पहले यानी आज 19 नवम्बर की सुबह से दोपहर तक ठाकुर राम पटेल के बच्चों ने कुछ भी नहीं खाया था । सूअर का मांस उसकी मां काट रही थी और बच्चे उसे खा रहे थे । कच्चा सूअर का मांस खाने की बात किसी को सहसा यकीन नहीं होता लेकिन राजधानी के गरीबों के बीच जाकर हकीकत देखी जा सकती है।
ठाकुर राम पटेल का कहना है कि भाजपा तथा कांग्रेस वाले वोट देने के लिए शराब बांट रहे है । उससे उसका क्या होने वाला है। कम से कम उन्हें अनाज देना चाहिए ताकि वह बच्चों का पेट पाल सके। वह दिन भर कबाड़ का काम करने के बाद भी इतना नहीं कमा पाता कि दोनों वक्त की रोटी बच्चों को खिला सके। उसकी झोपड़ी में कांग्रेस और भाजपा दोनों का चुनावी झण्डा लहरा रहा है। वह कहता है कि दोनों पार्टी के लोग झण्डा लगाकर चले गये हैं, लेकिन किसी ने उनका दर्द समझने की कोशिश नहीं की ।
प्रस्तुतकर्ता-दिलीप जायसवाल
शनिवार, 1 नवंबर 2008
भगवान ने उसके लिए बंद कर ली है आंख
राजधानी रायपुर स्थित लाखेनगर भोईपारा स्थित भवानी मंदिर में शांति नामक एक महिला अपने पति के साथ तब तक काम की जब तक उसके हांथ-पैर चले और जब उसके पति की मौत हो गई तो उसे मंदिर प्रबंधन ने मंदिर से बाहर निकाल दिया। इस महिला की हालत यह है कि आज उसके हांथ पैर तक नहीं चल रहे और उसे दो वक्त की रोटी के लिए ही नहीं तरसना पड़ रहा है बल्कि सिर छुपाने के लिए कोई जगह भी नहीं है। वह मंदिर से चंद कदम की दूरी पर एक चौराहे में बने घर की ओट पर पिछले तीन सालों से पड़ी हुई है। वह बताती है कि आस-पास के लोग उसे खाने के लिए कुछ ला देते है।
मंदिर प्रबंधन यह बात जरुर स्वीकार करता है कि शांति अपने पति के साथ मंदिर में काम करती थी लेकिन उसे वृध्द होने पर बाहर क्यों निकाला गया। मंदिर प्रबंधन के पदाधिकारियों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। शांति की एक बेटी है जिसकी शादी के बाद उसके पति की भी मौत हो गई है। वह भी उसे कभी-कभार ही देखने पहुंचती है।
शांति कहती है कि उसने तो अपनी जिंदगी का अहम दिन मंदिर में मां भवानी की सेवा में ही गुजार दी। उसके बाद भी उसे यह दिन देखने पड़ रहे है। शायद भगवान को यही मंजूर है। वह मंदिर प्रबंधन को दोष नहीं दे रही है। लेकिन आस-पास के लोग यह कहने से भी नहीं चुकते की कम से कम मंदिर प्रबंधन को चाहिए था कि वह शांति की देख-रेख नहीं कर पाने पर वृध्दाआश्रम पहुंचा देता। उसके कमर में गिर जाने के कारण चोट लगी हुई है और वह इस कारण उठ भी नहीं पाती । वह घर की ओट में नाली के किनारे इस तरह पड़ी हुई है जैसे इस दुनिया में उसका कोई न हो। आस-पास के लोगों ने बताया कि शांति ने अंतरजातीय प्रेम विवाह किया था और उसके पति की मौत मंदिर में काम करने के समय ही दमा से पीड़ित होने के कारण हो गई।
प्रस्तुतकर्ता-दिलीप जायसवाल
सोमवार, 20 अक्टूबर 2008
चुनाव से पहले नक्सलियों का खतरनाक इरादा
प्रस्तुतकर्ता दिलीप जायसवाल

