रविवार, 22 फ़रवरी 2009

राजिम कुंभ में धर्म और संस्कृति के बीच तड़पता सच्चाई,सागर माली की दास्तां

छत्तीसगढ़ राजिम कुंभ में धर्म और संस्कृति के बीच देश की एक सच्चाई भी दिखाई दे रही है। दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में मध्यप्रदेश के जबलपुर से पहुंचे सागर माली के बच्चो को देखकर सभी धर्म और संस्कृति दूर-दूर तक गायब नजर आता है। बच्चों के पास न तो तन ढकने के लिए कपड़े हैं और न ही पेट की आग बुझाने के लिए रोटियां । बच्चे कुपोषण का शिकार हो चुके हैं। इन सबके बाद भी आस्था का लाबदा ओढ़ने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। राजिम कुंभ में हर रोज हजारों की संख्या में आस्था की डूबकी लगाने वाले पहुंच रहे हैं। ऐसे में जबलपुर से सागर माली भी पहुंचा है, लेकिन वह कोई धर्म या आस्था के सरोकार के साथ नहीं पहुंचा है। उसके चेहरे में तो हमेशा बच्चों की भूख और गर्भवती पत्नी की चिंता दिखाई देती है। सागर माली ने बताया कि उसकी शादी सन 1992 में हुयी थी और उसकी सबसे बड़ी बेटी कावेरी है, वह उसे पढ़ाना भी चाहता था लेकिन गरीबी के कारण नहीं पढ़ा सका। उसे छोटा बेटा मानिक भी स्कूल नहीं जा सका। फूलकी, सूरज , अर्जुन, सरस्वती,शिवम चारों आंगनबाड़ी में जाते हैं। इसके बाद भी सूरज का चेहरा सूरज की तरह नहीं चमक रहा बल्कि सूरज कुपोषण का शिकार हो चुका है । उसके पेट बाहर निकले हुए हैं। इस पर सागर कहता है कि वह क्या करे, बच्चों का पेट पालने के लिए ही वह जंगलों में जाकर जड़ी-बूटी एकत्र करता है और उसे किसी भी मेले या बाजार में ले जाकर बेचता है। यहां भी वह रामकंद बेचने आया है। वह एक अखबार को दिखाता है जिसमें उसे राजिम कुंभ में रामकंद बेचते दिखाया गया है । दूसरे फोटो के साथ उसे उसमें राजिम कुंभ का आकर्षण बताया गया है। इस आकर्षण के पीछे की सच्चाई शायद लोग जानना भी नहीं चाहते । सागर माली सात बच्चॊ और पत्नी के साथ यहां कुंभ में एक झोपड़ी बनाकर रह रहा है। झोपड़ी भी हर रोज उजड़ जाती है, आखिर नदी की बालू में कोई घरौंदा भी कब तक ठहर सकता है। सात बच्चे होने पर सागर कहता है कि वह क्या करें ,उसके समाज में महिलाओं का आपरेशन नहीं किया जा सकता है। जब उसे गांव की नर्स ने नसबंदी कराने के लिए कुछ दिन पहले कहा तो वह नसबंदी करा लिया है। राजिम कुंभ में सागर माली ही अकेला ऐसा नहीं है बल्कि समाज और परिस्थितियों की विडंबना से जाने कितने लोग घिरे हुए दिखाई देते हैं। ऐसा नहीं है कि इन्हें इस त्रासदी से दूर नहीं किया जा सकता है। लेकिन कईयों की नजर भी तो इसे देखना पसंद नहीं करता।

राजिम कुंभ पर संकट के बादल, आस्था की धरती के साथ मजाक


छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाने वाला राजिम कुंभ पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। राजिम कुंभ में शाही स्नान के लिए गंगरेल बांध का पानी भरना पड़ रहा है । राजिम का संगम स्थल जनवरी माह के अंत में ही सूख गया था। महानदी,सोढूर और पैरी तीनों नदियों का जल स्तर तेजी से घटा है। आश्वासन और दावों तथा चिंतन मंथन को छोड़ दिया जाए तो नदियों का जल स्तर बढ़े इसके लिए कोई प्रयास भी नहीं किया जा रहा है। यही हाल रहा तो राजिम कुंभ में क्या श्रध्दालु रेत से स्नान करेंगे? मध्य प्रदेश से विभाजित होकर जब छत्तीसगढ़ राज्य बना और भाजपा की रमन सरकार आयी , राजिम में हर साल कुंभ का आयोजन शुरू हुआ, जो इस साल भी आयोजित की गई है। यहां साधु संतो का जमावड़ा भी लगा हुआ है । हालांकि इस साल पिछले वर्ष की तुलना श्रध्दालुओं की संख्या कम हुयी ही है साधु संतो में भी उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। हालांकि प्रशासन की ओर से प्रयाप्त व्यवस्था है इन सब के बाद भी दूर दराज से आने वाले लोग जब इस बात से अवगत होते हैं कि वे जिस पानी से नहा रहें है वह किसी बांध का है । इससे उन्हें तााुब होता है कि तीनों नदियों के संगम में बांध का पानी लाना पड़ रहा है। पुणे से पत्नी के साथ पहुंचे स्वामी प्रेम बादशाह इस पर कहते हैं कि यह चिंता की बात है इस ओर ध्यान देने की जरूरत है । सिर्फ जागरूकता की बात करने से ही कुछ नहीं हो सकता । वे भी मानते हैं कि राजिम संगम स्थल सर्दी का मौसम खत्म होते-होते अगर सूख जाता है तो इसके लिए बहुत जल्द सरकार को गंभीर होने की जरूरत है नहीं तो राजिम महाकुंभ में शाही स्नान किस तरह हो पाएगा, यह भी चिंता की बात है।जहां एक ओर संगम स्थल पर सूखे की ग्रहण लगी हुयी है वहीं दूसरी तरफ कुछ साधु-संत तो राजिम कुंभ को महज सरकारी कार्यक्रम मानने लगे हैं। हरिद्वार से पहुंचे एक संत का कहना था कि ऐसा कोई माहौल या आस्था नहीं दिखाई देती कि यहां कुंभ का आयोजन हो। इसके अलावा एक संत ने तो यहां तक कह डाला कि राजिम कुंभ राजनीति का अखाड़ा बन जाए तो कोई बात नहीं। यहां उल्लेखनीय होगा कि राजिम में प्रवचन देने वाले साधु-संत धर्मान्तरण की बात कर समाजिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश कर रहें है। वहीं कुछ सरकार या फिर नेताओं की तरफदारी कर यहां पहुंचने वाले श्रध्दालुओं एवं आस्था की भूमि के साथ मजाक कर रहें हैं।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

पेड़ों पर आशियाना


पेडों पर आशियाने की कल्पना कभी बीहड लगती है तो कभी बडी रोमांटिक। लेकिन पेडों पर आशियाना तमाम सहूलियतों वाला हो तो वहां टिकने का मन किसका न करेगा। अमेरिका के ओरेगोन में खूबसूरत दक्षिणी इलाके में ऐसा ही एक ट्रीहाउस रिसॉर्ट है। आउट एन अबाउट अब दुनियाभर में लोकप्रिय है, न केवल एक रिसॉर्ट के रूप में बल्कि दुनियाभर में पेडों पर आशियाना बनाने के शौकीन लोगों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में। सिसकियू पहाडियों के बीच ताकिलमा की खूबसूरत घाटी में ईस्ट फोर्क इलियोनिस नदी के उद्गमस्थल के ठीक नीचे यह ट्रीहाउस रिसॉर्ट है। बलूत [ओक] के पेडों की डालों पर बने हैं अलग-अलग तरह के ट्रीहाउस। सब कुछ पेडों पर। यह एक अलग ही दुनिया नजर आती है।
लेकिन इस रिसॉर्ट को खडा करने के लिए केवल कल्पना ही नहीं बल्कि लंबी कानूनी लडाई की भी जरूरत पडी। स्थानीय प्रशासन ने टिकने वालों की सुरक्षा का हवाला देते हुए इसे लाइसेंस नहीं दिया। लाइसेंस न मिला तो किराये पर नहीं दिया जा सकता था, इसलिए इसके संचालकों ने खास टीशर्ट बेचकर कमरे मुफ्त में दिए। आठ साल तक चली कानूनी जंग के बाद स्थानीय प्रशासन ने इन पेड-मकानों में सुरक्षा इंतजामों को स्वीकार किया और इसे लाइसेंस व ग्राहक मिले। आज यह यहां स्थापित ट्रीहाउस इंस्टीट्यूट दुनिया में अकेली जगह है जो ट्रीहाउस बनाने के बुनियादी इंजीनियरिंग, डिजाइन व निर्माण के तरीकों के बारे में गैरव्यावसायिक शिक्षा देती है।
यह रिसॉर्ट अनूठा है, इसलिए कई कायदों वाला है। यहां अलग-अलग सुविधाओं वाले कई ट्रीहाउस हैं। कई ट्रीहाउस ऐसे हैं जो तमाम सुविधाओं से परिपूर्ण हैं। जो नहीं हैं उनके लिए ट्रीरिसॉर्ट में बीच में एक बडा बाथहाउस व पैवेलियन है। मेन हाउस के किचन में हर सवेरे नाश्ता दिया जाता है। पैवेलियन में लांड्री, खेल व किचन की सुविधाएं हैं। लंच व डिनर तैयार करने के लिए बार-बे-क्यू, ग्रिल, कैंपफायर, पिकनिक टेबल वगैरह भी हैं। मजे के लिए झूले हैं, कई तरह के रोमांचक खेल [इनमें से कई पेडों से जुडे हुए], वॉलीबॉल कोर्ट और नदी के पानी से भरा रहने वाला मौसमी स्विमिंग पूल है। ट्रीहाउस में गरमियों का मौसम बच्चों व परिवारों से भरा-पूरा रहता है। यह एक समर कैंप की तरह हो जाता है। लिहाजा रोमांटिक लोग ऑफ सीजन में आना पसंद करते हैं।
यहां के द स्वीट को इंजीनियरिंग का कमाल माना जाता है। स्कूलहाउस स्वीट पूरे सालभर खुला रहता है। भीतर से गरम रहता है और इसमें छह मेहमान ठहर सकते हैं। इसका अपना बाथरूम है, टब है। रसोई में फ्रिज है, माइक्रोवेव, कॉफी मेकर, टोस्टर, बर्तन और छह लोगों की जरूरत की सारी चीजें। इसी में एक मास्टर बेडरूम है, दो बच्चों के लिए अलग से लॉफ्ट और बैठकखाना भी। पूरा घर सरीखा और सब कुछ पेड पर। है न हैरत की बात। स्विस फैमिली कॉम्प्लेक्स मार्च से अक्टूीबर तक खुला रहता है। पीकॉक पर्च पूरे साल खुला रहता है। इस तरह के कई अनूठे ट्रीहाउस इस रिसॉर्ट में हैं। जैसे कि ट्रीजेबो 37 फुट की ऊंचाई पर सबसे ऊंचा ट्रीहाउस है। कुछ ऐसे ट्रीहाउस भी हैं जिनका रास्ता पूरी तरह सुरक्षित है फिर भी डर जाने वालों के लिए नहीं। एक ट्रीहाउस से दूसरे पर जाने के लिए कई झूलते रास्ते बने हुए हैं।
सबसे महंगे स्वीट यानी ट्री रूम स्कूलहाउस का एक दिन का किराया चार लोगों के लिए ढाई सौ डॉलर है। सारे किरायों में नाश्ता शामिल है। इसी तरह अलग-अलग ट्रीहाउस के लिए किराये दो सौ डॉलर से 120 डॉलर तक हैं। इन किरायों में ठहरने वाले लोगों की संख्या भी निर्धारित है। प्रत्येक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए 20 डॉलर देने होते हैं। जो लोग यहां ठहर नहीं सकते, वे इसे घूमने के लिए भी जा सकते हैं। अप्रैल से अक्टूबर तक हफ्ते में तीन दिन दिन में दो घंटे के लिए इस रिसॉर्ट की सैर की जा सकती है। इसके लिए किराया पांच डॉलर प्रति व्यक्ति है।
इसके अलावा कई तरह की अन्य गतिविधियां भी हैं जिनके लिए शुल्क देकर उनका मजा लिया जा सकता है। इनमें घुडसवारी व राफ्टिंग से लेकर आर्ट एंड क्राफ्ट तक सब शामिल है। लेकिन यहां अपने पालतू जानवरों को लेकर जाने की इजाजत नहीं है। सुरक्षा के लिहाज से तूफान के दिनों में या भारी हिमपात के दौरान इस रिसॉर्ट में ठहरने पर कुछ पाबंदियां लग जाती हैं।
इसे एक ट्रीहाउस वंडरलैंड कहा जा सकता है। यहां कुल 18 ट्रीहाउस हैं, सात झूलते पुल हैं, कई सीढियां, रस्सियां, प्लेटफार्म, और न जाने क्या-क्या हैं- पेडों पर बसी इस नगरी को चलाने के लिए। पूरा रिसॉर्ट 36 एकड इलाके में फैला हुआ है। पूरी तरह एक घरेलू उद्यम है। इसे बनाने के लिए कितनी मेहनत की गई होगी, यह यहां आकर ही समझा जा सकता है। लेकिन यह यकीनन ऐसी जगह है जिसका अनुभव अनूठा ही होगा। अगली बार यदि अमेरिका के ओरेगोन इलाके में जाएं तो यहां जाना न भूलें।
उपेंद्र स्वामी

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

नक्सलियों का ह्रदय परिवर्तन सरकार के लिए चुनौती


छत्तीसगढ क़ो नक्सली समस्या मध्यप्रदेश काल से विरासत में मिली हैं। छत्त्तीसगढ तीन दशक से नक्सली समस्या से जूझ रहा है। राज्य बनने के बाद नक्सलियों की गतिविधियां तेज हुई और सरगुजा तथा बस्तर में खूनी खेल शुरू हुआ। आठ सालों में सैकड़ों पुलिस के जवान, नक्सली और आम आदमी मारे गये। ऐसे में नक्सलियों ने सरकार से शांतिवार्ता की पेशकश की है। नक्सलियों के ह्रदय परिवर्तन को बता रही है। सरकार भी नक्सलियों से बातचीत के लिए तैयार है। जो सुखद है,लेकिन बातचीत से पहले नक्सलियों द्वारा रखी जा रही शर्ते सरकार के सामने उलझन पैदा करती हुई दिख रही है। अगर बातचीत निशर्त: होती है तो महत्वपूर्ण होगा।मीडिया से नक्सली प्रवक्ता कामरेड पांडू ने जिस तरीके से बातचीत की पेशक श की है और कहा है कि सरकार के मंत्री उनके साथ अबुझमाड की जंगल में आकर बातचीत कर सकते हैं। वे सुरक्षा की गांरटी लेते हैं और सरकार के लोग नहीं आना चाहते तो उन्हें बुलाएं , वे रायपुर आ सकते हैं। ऐसे मे एक बात तो साफ है कि नक्सली भी अब खून खराबा नहीं चाहते । हालांकि पांडू ने कहा है कि यह उनका युध्द विराम का प्रस्ताव मात्र है इसे युध्द विराम नहीं समझना चाहिए। उधर पांडू ने यह साफ कर दिया है कि नक्सली राष्ट्रीय स्तर पर शांति वार्ता के लिए तैयार हैं। नक्सलियों से पहले भी राय सरकार बातचीत के लिए मंचों से बात करती रही है लेकिन नक्सली बातचीत करने के लिए तब दिखाई दे रहे हैं जब उन्हें एहसास हो गया है कि जिस उद्देश्य से नक्सल आंदोलन शुरू हुआ था उसमें भ काव आ गया है। वहीं बस्तर घनघोर जंगल में सुरक्षा एजेंसियों के जवानों की जवाबी कार्यवाही भी नक्सलियों की कमर तोडी है। बात चाहे जो भी हो सरकार को सजगता के साथ आगे बढ़कर काम करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने कहा है कि बातचीत के लिए अधिकारियों का पैनल तैयार किया जायेगा। वहीं गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने नक्सलियों के इस फैसले का स्वागत किया है और कामरेड पांडू को शांति वार्ता की पेशकश करने पर बधाई दी है।नक्सलियों द्वारा शांति वार्ता के लिए आधा दर्जन मांग सामने रखा गया है। जिसे सरकार को गंभीरता से लेने की जरूरत है। जो शर्ते रखी गई है। उनमें सलवा -जुडूम को बंद करने, सिंगावरम में हुए नरसंहार की जांच एवं कार्यवाही , सलवा-जुडूम शिविरों को बंद करने , छत्तीसगढ़ में जन सुरक्षा अधिनियम को रद्द करने नक्सलियों और उनसे जुडे संगठनों पर लगाया गया प्रतिबंध हटाया जाये, जंगल में कार्पोरेट सुरक्षा या अर्धसैनिक बलों तथा कोबरा बटालियन जैसी फौज रद्द कर उन्हें वापस भेजने की मांग शामिल है। जहां तक सलवा -जुडूम की बात है सरकार इसे अब तक ग्रामीणों का स्व स्फूर्त आंदोलन बताती रही है। सरकार से सहयोग और सुरक्षा प्रदान करने की बात करती है। सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट भी सवाल उठा चुका है। वहीं सलवा जुडूम के शिविरों में 60 हजार से यादा लोगा रह रहे हैं। ऐसे में सलवा जुडूम बंद कराने से पहले नक्सलियों को विश्वास जीतने की जरूरत है। सलवा जुडूम के लोगों का घर भी नहीं बचा है और खेती किसानी भी चौपट हो गई है। ऐसे में शिविरों को बंद कर उन्हें नई जिन्दगी दिलाना भी एक बड़ी चुनौति होगी । सलवा जुडूम के अलावा दूसरी शर्तो को भी आसानी से नहीं माना जा सकता क्योंकि सुरक्षा की लिहाज से कुछ शर्तों को स्वीकार करना किसी खतरे से कम नहीं है। अगर बातचीत को सफल होती है तो छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह हमेशा के लिए दर्ज हो जायेगा कि भाजपा की रमन सरकार नक्सलियों के युध्द विराम के प्रस्ताव को स्वीकार करने में सफल रही । कामरेड पांडू और छत्तीसगढ़ की मीडिया भी इतिहास के पन्नों पर दिखाई देगी। इन सब बातों से पहले सरकार के नेता मंत्रियों और सरकारी नुमाईंदों को यह हमेशा के लिए याद रख लेना चाहिए कि शांति वार्ता के बाद कभी ऐसी स्थिति न बने जिससे कोई हिंसात्मक आंदोलन शुरू हो। वर्तमान का सामाजिक , राजनैतिक ,आर्थिक तथा व्यवस्था रूपी ढंाचा पूरी तरह संक्रमित हो चुका है। जिसे शांति वार्ता होने के बाद ठीक कर पाना सरकार के सामने बडी चुनौती होगी । यहां पर उल्लेख करना जरूरी होगा कि राय सरकार जहां एक ओर नक्सलियों से बातचीत करने का पहले से ही प्रयास कर रही थी । वहीं मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह कुछ दिन पहले एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में यहां तक बोल दिये कि अब वे जवानों से कहेंगे शहीदों के लिए मोमबत्ती जलाना छोड़ों और गोली चलाओं । वहीं गत दिनों नागपुर में भाजपा की आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारणी समिति की बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हिंसा का जवाब हिंसा से दिया जायेगा। नेताओं को भी चाहिए कि वे ऐसी उग्र और असवैधानिक बात करने से पहले जरा सोच लें। जुबान बहुत बड़ी चीज होती है, हीरों बनने के लिए इसका वहीं तक उपयोग करना चाहिए जहां तक बात दिल को स्वीकार्य हो।प्रस्तुत्तक‌र्ता दिलीप् जायसवाल्

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

खबरों के प्रसारण पर नए दिशानिर्देश

मुंबई आतंकी हमलों जैसी स्थिति के प्रसारण के लिए मौलिक मानक को ध्यान में रखते हुए न्यूज ब्रॉड कास्टर्स एसोसिएशन [एनबीए] ने बुधवार को नए विशेष दिशानिर्देश पेश किए, जिनमें ऐसी घटनाओं के लिए निष्पक्षता परिशुद्धता और स्पष्टता पर जोर दिया गया है।
दिशानिर्देशों का निर्धारण एनबीए प्राधिकार की एक बैठक में किया गया जिसकी अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे एस वर्मा ने की। दिशानिर्देशों में कहा गया है कि खबरों की रिपोर्टिग जनहित को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। इसके साथ ही परेशानी पैदा करने वाली स्थितियों की रिपोर्टिग में प्रसारकों को स्वविवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।
दिशानिर्देशों के अनुसार उन्हें आपरेशन के दौरान ऐसी गोपनीय सूचना का खुलासा नहीं करना चाहिए जिनसे राष्ट्रीय हित जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही षड्यंत्रकारियों के साक्षात्कारों का लाइव प्रसारण नहीं किया जाना चाहिए। परिशुद्धता पर जोर देते हुए नए नियमों में कहा गया है कि अगर संभव हो तो एक से अधिक स्रोतों से जानकारी जुटानी चाहिए। संवाद एजेंसियों से प्राप्त खबरों में उनका उल्लेख किया जाना चाहिए और संभव होने पर उसकी पुष्टि की जानी चाहिए।
इसके साथ ही नियमों में कहा गया है कि आरोपों को सही रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। तथ्यों में गड़बड़ी को जल्द से जल्द सुधार कर लेना चाहिए। संतुलित कवरेज पर जोर देते हुए नियमों में कहा गया है कि प्रसारकों को निष्पक्ष होना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विवादित विषयों से संबंधित खबरों में बिना किसी एक पक्ष को महत्व देते हुए विभिन्न विचार शामिल किए जाएं। नियमों में यह भी कहा गया है कि सामग्री के संपादन में प्रसारकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि घटनाओं की रिपोर्ट और तथ्यों में कोई छेड़छाड़ नहीं हो।

शादी गर दवा है तो..

शादी मजाक नहीं। लेकिन अकेले जी रहे इंसान के लिए यह किसी दवा से कम भी नहीं। अच्छा जीवन साथी न सिर्फ सकारात्मक बनाता है, वह मुश्किल घड़ी में भावनात्मक सहारा भी बनता है। तो इस वेलेंटाइन डे पर शादी नहीं करने पर दृढ़प्रतिज्ञ लोगों को हमारी सलाह यही है कि वे एक बार फिर अपने निर्णय पर गंभीरता से विचार कर लें।
दवा से कम नहीं है:
वैसे तो दुनिया की कोई किताब या इंसान यह ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि शादी आपके लिए सही है या नहीं? लेकिन अब वैज्ञानिकों ने भी मान लिया है कि लंबी, स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी चाहिए तो शादी न करने की जिद छोड़ दें। बीते 150 ंवर्षो में हुए कई अध्ययनों में कहा जा चुका है कि शादीशुदा लोग कुंवारों के मुकाबले ज्यादा जीते हैं।
बड़े काम की चीज शादी :
शादी के कई फायदे हैं। यह बुढ़ापे में अकेलेपन से बचाती है। प्रतिदिन आपको अपने पसंदीदा व्यक्ति के साथ डिनर का मौका मिलता है। इसे कुंवारेपन का वैकल्पिक इलाज भी कहा जा सकता है। यह दवा खासतौर पर उन लोगों के लिए कारगर है जिन्हें उनका सच्चा प्यार मिल गया है।
ये तो अकेले ही भले :
शादी उन लोगों के लिए दवा नहीं है जिनका तलाक का मामला चल रहा है। जमीन-जायदाद और कानूनी झमेलों में फंसे लोग भी इससे दूर ही ही रहें तो बेहतर। अगर आपको लोगों से समन्वय बैठाने में दिक्कत आती है तो भी शादी से दूर ही रहें।
कुछ चेतावनियां और उपाय:
अगर आपको अंदाजा नहीं है कि शादी के बाद आप की प्रतिक्रिया क्या होगी तो इस दिशा में अपने कदम सोच-समझ कर ही उठाएं। शादी हो चुकी है तो जीवन साथी के साथ बातचीत में थोड़ी सावधानी बरतें। कई बार छोटी-छोटी बातें और गलत प्रतिक्रिया बड़े विवाद की वजह बन जाते हैं। आकड़े बताते हैं कि तलाक की सबसे बड़ी वजह मियां-बीवी के बीच मतभेद बनते हैं। और हां, शादी के बाद शराब से दूर ही रहें तो अच्छा।
शादी के साइड इफेक्ट :
हर दवा की तरह शादी के भी साइड इफेक्ट हैं। कई बार अजीबो-गरीब ख्याल परेशान करते हैं। आपको भूलने की बीमारी होने का अंदेशा हो सकता है। तो कुछ एक बार आत्महत्या के विचार भी आ सकते हैं। हालांकि इसके पीछे आपकी अपनी गलतियां ही जिम्मेदार होती हैं।
कुछ गंभीर मुद्दे:
अचानक आप खुद को जिम्मेदार और बड़ा महसूस करने लगेंगे। सेक्स में रुचि घट सकती है या दूसरी महिलाओं के प्रति आकर्षण बढ़ सकता है। शादी होगी तो बच्चे होंगे ही जो वाकई बड़ी जिम्मेदारी होते हैं।
गलतियों को नजरअंदाज करें:
खुशहाल शादी के लिए चाहिए कि आप आपसी लगाव को बनाए रखें। जहां तक हो सके एक दूसरे की गलतियों को नजरअंदाज करें।
आखिर में:
शादी लंबे, स्वस्थ और खुशहाल जीवन की सबसे सुरक्षित और प्रभावशाली दवा है। लंबे समय का साथ, आत्मसंतुष्टि, प्यार और विश्वास इसके अन्य फायदे हैं। हालांकि यह दवा किसके लिए कितनी फायदेमंद साबित होती है यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है।

.. जहां गढे़ जाते हैं भविष्य

राजधानी दिल्ली..अरावली की पहाडी..हर तरफ हरियाली का नजारा और इन्हीं हरियाली के बीच एक ऐसा विश्वविद्यालय, जो न केवल भारत की शान है, बल्कि जहां गढे जाते हैं सुनहरे भविष्य के ताने-बाने भी। जी हां, हम बात कर रहे हैं, वर्ष 1969 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम से स्थापित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की। वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित कर चुके इस विश्वविद्यालय में एडमिशन को लेकर न केवल भारतीय, बल्कि विदेशी छात्रों में भी बेहद क्रेज रहता है। उल्लेखनीय है कि करीब साढे पांच हजार स्टूडेंट्स और लगभग 550 फैकल्टी के स्ट्रेंथ वाले इस विश्वविद्यालय में रिसर्च ओरिएंटेड पोस्टग्रेजुएट कोर्स को अधिक प्रमुखता दी गई है। यहां कई तरह के कोर्स संचालित किए जाते हैं। खास बात यह है कि इन कोर्सो की फीस काफी कम है। लेकिन हम यहां आपको बताने जा रहे हैं जेएनयू के पॉपुलर लैंग्वेज कोर्स के बारे में, जिसमें एडमिशन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। एडमिशन की प्रक्रिया से रूबरू होने से पहले हम जानते हैं, जेएनयू में उपलब्ध लैंग्वेज कोर्स और संभावनाओं के बारे में..
लैंग्वेज कोर्स
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर ऐंड कल्चर स्टडीज के अंतर्गत प्रमुख लैंग्वेज कोर्स की पढाई के साथ-साथ रिसर्च की सुविधा भी मौजूद है। आइए, अब नजर डालते हैं, जेएनयू में उपलब्ध प्रमुख लैंग्वेज कोसरें पर..
बैचलर ऑफ आ‌र्ट्स कोर्स (आनर्स) : पर्सियन, अरेबिक, चाइनीज, जेपनीज, कोरियन, फ्रेंच, जर्मनी, रशियन और स्पेनिश।
मॉस्टर ऑफ आ‌र्ट्स कोर्स : इंग्लिश, लिंग्विस्टिक, उर्दू, हिन्दी,पर्सियन, अरेबिक, चाइनीज, जेपनीज, कोरियन, फ्रेंच, जर्मनी, रशियन और स्पेनिश।
पीएचडी/ एमफिल कोर्स : इंग्लिश, लिंग्विस्टिक, उर्दू, हिन्दी, पर्सियन, अरेबिक, चाइनीज, जेपनीज, कोरियन, फ्रेंच, जर्मनी, रशियन और हिन्दी ट्रांसलेशन। इसके अलावा, इटेलियन, मंगोलियन, पश्तो, पुर्तगाल और उर्दू भाषा में पार्ट-टाइम लैंग्वेज कोर्स भी उपलब्ध हैं।
नए सत्र की शुरुआत
जेएनयू में वर्ष 09-10 सत्र के लिए आवेदन प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है और विभिन्न कोर्स के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। वर्ष 09-10 सत्र में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा 15 से 18 मई, 2009 के बीच होगी। यहां संचालित होने वाले कोर्सो में एडमिशन के लिए आवेदन की अंतिम तारीख है-16 मार्च, 2009।
कैसे मिलेगी एंट्री
जेएनयू में एंट्री के लिए आपको एंट्रेंस एग्जामिनेशंस के दौर से गुजरना होगा। हालांकि कुछ कोर्सो में एडमिशन मौखिक परीक्षा के आधार पर भी होता है। खासकर लैंग्वेज कोर्स में एडमिशन लेने के लिए संबंधित भाषा पर आपकी अच्छी पकड होनी चाहिए। यदि आप बैचलर(आ‌र्ट्स) कोर्स में एंट्री चाहते हैं, तो 10+2 परीक्षा में कम से कम 45 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण होना जरूरी है। वहीं यदि आप एमए कोर्स में प्रवेश के इच्छुक हैं, तो ग्रेजुएशन में संबंधित विषय में न्यूनतम 45 प्रतिशत अंक होने चाहिए।
लैंग्वेज में स्कोप
आज पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज में तब्दील हो चुकी है। इसलिए लैंग्वेज की जानकारी न केवल करियर के दृष्टिकोण से, बल्कि कम्युनिकेशन के लिहाज से भी बेहद जरूरी है। उदाहरण के तौर पर, यदि आप बॉन्जॉर (bonjour) सुनिए या कॉमेंट अलैजव्यूस (comment allezvous) कैसे हैं आप जैसे शब्दों से परिचित नहीं हैं, तो पेरिस या मेड्रिड जैसे शहरों में आपको लोगों से कम्युनिकेट करने में मुश्किल हो सकती है। इंडस्ट्री अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2010 तक ऑफशोर इंडस्ट्री में एक लाख 80 हजार फॉरेन लैंग्वेज एक्सपर्ट की जरूरत होगी। वैसे, यदि आप फॉरेन लैंग्वेज में एक्सपर्ट हैं, तो टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, कॉल सेंटर, मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स आदि में नौकरियां मिल सकती हैं। आइए अब पडताल करते हैं किन लैंग्वेज एक्सपर्ट की है डिमांड इन दिनों :
जेपनीज : भारत और जापान के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध दिन ब दिन मजबूत हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में जेपनीज भाषा के जानकारों की डिमांड लगातार बढती ही जा रही है। खासकर इंटरप्रिटेटर की मांग अधिक है, जो बिजनेस ग्रुप या ऑफिशियल डेलिगेट्स के साथ मिल कर काम करते हैं। वैसे, इनके लिए टूरिज्म, एयरलाइंस और हॉस्पिटैलिटी में तो बेहतर संभावनाएं हैं ही, साथ ही, यूनिवर्सिटीज और प्राइवेट इंस्टीटयूट में भी जेपनीज टीचर की अच्छी-खासी मांग है।
जर्मन : इन दिनों कॉमर्शियल क्लास में जर्मन लैंग्वेज इंटरप्रिटेटर की अच्छी डिमांड है। साथ ही, बीपीओ इंडस्ट्री को भी जर्मन बोलने वाले प्रोफेशनल्स की दरकार है। टूरिज्म, एयर लाइंस और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में ऐसे लोगों की जरूरत है, जो जर्मनी भाषा के जानकार हों।
चाइनीज : चाइनीज दुनिया की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण भाषा है। साथ ही, चीन ग्लोबल इकोनॉमी और पॉलिटिक्स में भी खास स्थान रखता है। हाल के वर्षो में भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध भी मधुर हुए हैं। ऐसी स्थिति में चाइनीज भाषा के जानकारों के लिए असीम संभावनाएं देखी जा रही हैं।
स्पेनिश : स्टूडेंट्स के बीच स्पेनिश लैंग्वेज का काफी क्रेज है। बीपीओ इंडस्ट्री में भी स्पेनिश जानने वालों की डिमांड बनी रहती है। इन भाषाओं के अलावा, कोरियन, फ्रेंच, रशियन आदि भाषाओं के जानकारों की भी मार्केट में अच्छी-खासी डिमांड है। इन भाषाओं के जानकारों को अच्छी सैलॅरी पैकेज भी मिलता है।
जेएनयू के अंतर्गत आने वाले स्कूल
स्कूल ऑफ आ‌र्ट्स ऐंड एस्थेटिक्स
स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी
स्कूल ऑफ कम्प्यूटर ऐंड सिस्टम्स साइंसेज
स्कूल ऑफ एन्वायरनमेंटल साइंसेज
स्कूल ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी
स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज
स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर और कल्चर स्टडीज
स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज
स्कूल ऑफ फिजिकल साइंसेज
स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज
स्पेशल सेंटर्स
सेंटर्स फॉर द स्टडी ऑफ लॉ ऐंड गवर्नेंस
सेंटर्स फॉर मॉलिकुलर मेडिसिन
सेंटर फॉर संस्कृत स्टडीज
सेंटर फॉर इंटरनेशनल ट्रेड ऐंड डेवलॅपमेंट
संक्षिप्त परिचय
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
स्थापना : वर्ष 1969
चांसलर : प्रो. यशपाल
वाइस चांसलर : बी.बी.भट्टाचार्या
लोकेशन : नई दिल्ली
एफिलिएटेड : यूजीसी
वेबसाइट : www.jnu.ac.in
पॉपुलर हैं पीएचडी कोर्स
जेएनयू के लैंग्वेज कोर्स की अपनी एक अलग पहचान है। यहां केवल देशी ही नहीं, बल्कि विदेशी स्टूडेंट्स भी पढाई के लिए आते हैं। यहां के लैंग्वेज कोर्स की क्या है वैल्यू? हमने बात की जेएनयू में स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर ऐंड कल्चरल स्टडीज के डीन प्रो. शंकर बसु से। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश..
वर्तमान में भारतीय छात्रों के लिए लैंग्वेज कोर्स करना कितना फायदेमंद है?
वैश्वीकरण के कारण देश में मल्टीनेशनल कंपनियां बडेे पैमाने पर आई है, जिनमें ऐसे प्रोफेशनल्स की डिमांड बढी है, जो विदेशी भाषाओं का जानकार हों। इसके अलावा, नए-नए देशों से हमारे व्यापारिक रिश्ते भी फॉरेन लैग्वेंज को बढावा दिया है। यही वजह है कि सामान्य स्टूडेंट्स भी विदेशी भाषाओं के कोर्स के प्रति आकर्षित हुए हैं।
जेएनयू का लैंग्वेज कोर्स कितना पॉपुलर है?
यहां लैंग्वेज की पढाई वर्षो से चल रही है। वहीं अधिकतर यूनिवर्सिटीज ने हाल में ही लैंग्वेज प्रोग्राम की शुरुआत की है। हमारे यहां छात्रों को भाषा की गहन शिक्षा के अलावा, रिसर्च की बेहतर सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती है। जेएनयू से पास-आउट होने के बाद करियर विकल्पों की कमी नहीं है।
किस लैंग्वेज कोर्स की पॉपुलरिटी इन दिनों अधिक है?
फॉरेन लैंग्वेज में इन दिनों जेपनीज, कोरियन, चाइनीज आदि कोर्स स्टूडेंट्स के बीच काफी लोकप्रिय हैं, क्योंकि इन कोर्सो में करियर की संभावनाएं इन दिनों अधिक हैं, जबकि विदेश से आने वाले ज्यादातर छात्र अंग्रेजी और लिंग्विस्टिक कोर्स को तवज्जो देते हैं। वैसे, पिछले चार-पांच वर्षों में रशियन लैंग्वेज में भी अच्छी डिमांड देखी जा रही है।
किस लैंग्वेज कोर्स में स्टूडेंट्स पीएचडी करना अधिक पसंद करते हैं?
इन दिनों अधिकतर छात्र फॉरेन लैंग्वेज की अपेक्षा अंग्रेजी, हिन्दी के अलावा, अन्य भारतीय भाषाओं में पीएचडी कोर्स करते हैं। इसकी वजह यह है कि फॉरेन लैंग्वेज कोर्स में ज्यादातर छात्र एमए करने के बाद जॉब करने लग जाते हैं।
विदेशी छात्रों के बीच जेएनयू की लोकप्रियता की वजह क्या है?
विदेशी छात्र भारत में आकर हायर एजुकेशन इसलिए भी लेना चाहते हैं, क्योंकि यहां कोर्स फीस, लिविंग कॉस्ट आदि अन्य देशों के अपेक्षा काफी कम है। साथ ही, रिसर्च के लिए जेएनयू देश-विदेश में विख्यात है।
फॉरेन लैंग्वेज में करियर बनाने के लिए किस स्तर तक की पढाई जरूरी है?
फॉरेन लैंग्वेज में करियर बनाने के लिए फुल-टाइम कोर्स करना बेहद जरूरी है। कम से कम एमए तक पढाई करना बेहद जरूरी है। इसके बाद ही स्टूडेंट्स लैंग्वेज में बेहतर करियर बना सकते हैं।

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

भाषा के विवाद पर छत्तीसगढ़ियों को खलनायक बनाने की कोशिश

छत्तीसगढ क्षेत्रीयता और भाषा को लेकर राजनीति का शिकार हो रही है। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा की मान्यता मिलने के बाद अब छत्तीसढ़ियों को आंचलिक बोलियों के नाम पर बांटने की कोशिश हो रही है। छत्तीसगढ़ियों को भाषा के विवाद पर खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है, जो खतरनाक है। छत्तीसगढ़ियों और छत्तीसगढ़ी राजभाषा के साथ न्याय की जरूरत है और यह सिर्फ नजरिया बदलने से ही संभव है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है, क्योंकि छत्तीसगढ़ियों को भी अपना सम्मान प्यारा है।
हिन्दी और आंचलिक बोलियों के बीच अंतर संवाद विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन कुछ ऐसी ही आवाजें बुलंद हुई। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, छत्तीसगढी राजभाषा आयोग और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए रमेश नाथ मिश्र ने ने कहा कि दिल्ली सल्तनत का छत्तीसगढ़ में कभी शासन नहीं रहा। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की बोलियां सुरक्षित है। यहां मिले शिलालेखों में छत्तीसगढ़ी की समृध्दता दिखाई देती है। इसके अलावा सन् 1920-30 के तरम्यान में निकली विकास एवं उत्थान पत्रिका में हिन्दी भाषा के साथ छत्तीसगढ़ी देखा जा सकता है। पंडित सुन्दरलाल शर्मा ने जेल से जब पत्रिका निकाली थी उसमें भी छत्तीसगढ़ी का स्थान था। इसके अलावा पंडित लोचनप्रसाद, खूबचन्द बघेल सहित दूसरे साहित्यकारों ने भी छत्तीसगढ़ी को आगे बढ़ाया। श्यामलाल चतुर्वेदी ने कहा कि जिस प्रकार हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समांजस्य बनाकर काम किया जा रहा है वह अनुकरणीय है। छत्तीसगढ़ी की समृध्दता को समझने के लिए पांडू लिपियों को सामने लाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ी राजभाषा के आगे बढ़ने से हिन्दी को कोई नुकसान नहीं होगा। छत्तीसगढ़ी में आंचलिक बोलियों के शब्दों का समावेश किया गया है। इससे किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए । भाषा के विकास के लिए व्यक्तिवादी और राजनीतिक पूर्वाग्रहों को भूलकर काम करने की जरूरत है। बिहारीलाल साहू ने कहा कि किसी भी समाज में भाषा व भूमि को मां का दर्जा दिया जाता है। हिन्दी से छत्तीसगढ़ी राजभाषा का घुला हुआ संबंध है। हिन्दी अनेक भाषाओं का गुच्छा है। जिसमें छत्तीसगढ़ी भी शामिल है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ी का स्वरूप भिन्न है। उन्होंने कहा कि इसका प्रमुख कारण क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल से जोड़कर देखा जाता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बस्तर और सरगुजा दोनों क्षेत्रों में कई बोलियां हैं। आंचलिक बोलियों के नाम पर छत्तीसगढ़ियों को बांटने की कोशिश न की जाये। भाषा व्यवहार से समृध्द होती जाती है। राजभाषा को किसी सियासी फरमान से मजबूत नहीं किया जा सकता। इसे स्वतंत्र तरीके से व्यवहार में लाना पड़ेगा। संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए नंदकिशोर तिवारी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी पत्रिकाओं को दोयम दर्जे में रखा जाता है और छत्तीसगढियों को आपस में लड़ाने की कोशिश की जाती है। दुभार्ग्य की बात है कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा गया कि किसी भी राजभाषा को संविधान के आठवें अनुसूची में शामिल न किया जाये। व्यास नारायण दुबे ने कहा कि छत्तीसगढ़ी राजभाषा में 22 आंचलिक बोलियों को शामिल किया गया है।भाषा और विचार दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। श्री अशोक ने कहा कि भाषा की मौलिकता को मारने की कोशिश की जा रही है। सन् 2002 में राजनांदगांव में आयोजित साहित्य सम्मेलन में छत्तीसगढ़ी भाषा को आत्मा की संज्ञा दी गई थी। ऐसी भावुकता से बचने की जरूरत है। भाषा और बोली आत्मा नहीं होती बल्कि आत्मा तो संस्कृति होती है। उन्होंने भाषा की मानकीकरण पर जोर देते हुए कहा कि इसके बिना किसी भी भाषा का ढाचा नहीं बन सकता। भाषा और बोलियों के बीच छत्तीसगढ़ियों को आपस में लड़ाने से पहले सोच लेना चाहिए कि यहां के लोग कभी भी खलनायक नहीं बन सकते। छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच के उपसंयोजक जगेश्वर साहू ने कहा कि सरकार और प्रशासन में बैठे लोग भाषा के नाम पर लड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में हिन्दी और गैरछत्तीसगढ़ी लोग शासन प्रशासन में बैठे हुए हैं। उन्हें समझ लेना चाहिए कि सामाजिक समरसता और सभी कला संस्कृतियों को यहां सम्मान मिलता है। छत्तीसगढ़ के लोगों के साथ ही छत्तीसगढ़ी राजभाषा बोलने वालों के साथ न्याय की जरूरत है और इसके लिए नजरिया बदलना चाहिए । इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति बिगड़ सकती है क्योंकि अब छत्तीसगढ़ के भोले-भाले समझे जाने वाले लोग भी अपने सम्मान के लिए जीने लगे हैं। छत्तीसगढ़ी बोली को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया गया लेकिन यह कामकाज का भाषा कैसे बने इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। सरकार के ठेकेदारों को चाहिए कि अब वे राष्ट्रीय भाषा और राज्य भाषा में छत्तीसगढ़ी को सम्मान दिलायें। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय नेता पूरे देश को एक नजर से देखें और क्षेत्रवाद की राजनीति न होने दें। भले ही कार्यक्षेत्र क्षेत्रीय हो लेकिन भावना हमेशा राष्ट्रीय होना चाहिए । जगेश्वर साहू ने कहा कि विधानसभा में छत्तीसगढ़ी राजभाषा का प्रयोग करने के लिए शपथ लेने जब विधायकों की बारी आई तो कुछ ही विधायक शपथ लिये। छत्तीसगढ़ के लोग हमेशा से दगाबाजी सहते आये हैं। अब बर्दास्त नहीं किया जायेगा।

.... तॊ भारतीय भाषाओं को भगवान भी नहीं बचा सकते

देश के वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा है कि सरकार प्राथमिक शिक्षा से मातृभाषा को दूर करने का प्रयास कर रही है, ऐसा हुआ तो भारतीय भाषाओं को भगवान भी नहीं बचा सकते। देश के बीस रायों में कक्षा एक से ही अंग्रेजी की शिक्षा दी जा रही है। वर्तमान में भारतीय भाषाओं पर नहीं बल्कि भारतीयता पर संकट दिखाई दे रहा है। हिन्दी मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। वह भी हिन्दी भाषा की हत्या कर रही है।
कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, छत्तीसगढी राजभाषा आयोग और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के संयुक्त तत्वाधान में हिन्दी और आंचलिक बोलियों के बीच अंतर संवाद विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सीएनईबी चैनल के प्रमुख राहुल देव ने कहा कि समाज व देश की सम्प्रभुता के लिए एक भाषा की जरूरत होती है और उसी से खुद को देखना और समझना चाहिए। वर्तमान में भारतीय भाषाओं पर नहीं बल्कि भारतीयता पर संकट दिखाई दे रही है। भारत शब्द भी हिन्दी से धीरे-धीरे बाहर होता जा रहा है। भाषा को यंत्र या उपकरण माना जा रहा है,भाषा को माध्यम मानना भी किसी मूर्खता से कम नही है। भाषा को गंभीरता से लेने की जरूरत है। बदलती भाषा से मन बदलता है यही कारण है कि देश अपनी नजर से खुद को देखना भूल गया है। उन्होने कहा कि संकर भाषा जरूरी है, लेकिन भाषा को भ्रष्ट किया जाना घातक है। राहुल देव ने हिन्दी भाषा में अनावश्यक अंग्रेजी के प्रयोग पर चिंता जाहिर की और कहा कि वे अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं करते लेकिन जो स्थिति है ,वह हिन्दी के लिए नहीं बल्कि सभी भारतीय भाषाओं के लिए खतरनाक है।
वरिष्ठ पत्रकार राहुलदेव ने कहा कि सरकार देश को सन् 2050 तक महाशक्ति बनाना चाहती है और इसके लिए वह कक्षा एक से ही अंग्रेजी की शिक्षा अनिवार्य कर रही है। देश के 20 रायों में प्राथमिक शिक्षा के साथ ही अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हो गई है । ऐसे में सन् 2050 तक हिन्दी भाषा ही नहीं बल्कि किसी भी भारतीय भाषा के अस्तित्व को बचाना आसान नहीं होगा। उन्होंने हिन्दी मीडिया पर भी खुलकर कटाक्ष किया और कहा कि हिन्दी मीडिया हिन्दी भाषा की हत्या कर रही है।
वरिष्ठ पत्रकार एवं नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव ने कहा कि पत्रकारों के सामने सम्प्रेषण की समस्या दिखाई दे रही है। पैंतीस सौ अंग्रेजी के शब्द हिन्दी में है। हालांकि वर्तमान में अंग्रेजी के शब्दों का अनावश्यक प्रयोग हो रहा है। अखबार अंग्रेजी के शब्दों को जबरन ठूंस रहे हैं। एक-दूसरे भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए लेकिन फैशन के कारण ऐसा होना गंभीर है।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए लेखक एवं पत्रकार रमेश नैय्यर ने कहा कि भाषा में परिवर्तन आने से संस्कृति में भी उसका प्रभाव दिखाई देता है। देश में हिन्दी को विस्थापित करने का षड़यंत्र चल रहा है जो चिंता का विषय है। अंग्रेजी से कोई परहेज नहीं है लेकिन साम्रायवाद को समझने की जरूरत है। अगर हमें भारतीय अस्मिता का ख्याल है तो लोक भाषाओं के शब्दों के प्रयोग को गलत नहीं मानना चाहिए। भाषाओं के द्वार खुले रखने की जरूरत है।साहित्यकार डॉ सुशील त्रिवेदी ने कहा कि हिन्दी ही नहीं बल्कि दूसरी भाषाओं पर भी उपभोक्तावाद और वैश्वीकरण के कारण संकट है। सामाजिक अवधारणा भी बदल गई है पहले जैसे रिश्ते थे अब वैसा नहीं, अब सिर्फ निकट का ही रिश्ता रह गया है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी में मौलिक सोच को लाने में काफी देर हुआ। यह भी वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
दीनदयाल मानव अध्ययन शोध पीठ के अध्यक्ष रमाशंकर अगि्होत्री ने कहा कि साहित्य ने साहित्यकारों को पत्रकारिता से अलग कर दिया है। साहित्य वर्तमान में लक्ष्य की तलाश नहीं कर पा रहा है और ऐसे साहित्यकारों की फाौ बढ़ी है। साहित्य अपना परिचय भी भूल गया है और परिचय बताने वालों को साहित्यकारों ने भूला दिया है। साहित्य जगत में पत्रकारों को अभिष्ठान दिलाने की जरूरत है।
लेखक एवं साहित्यकार इंदिरा मिश्रा ने कहा कि हिन्दी अखबारों में हिग्ंलिस का प्रयोग हो रहा है। संपादकों को ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि अरबी और फारसी के सात हजार हिन्दी कोष में है। दूसरे भाषाओं के शब्दों को लेकर भाषा समृध्द होती है। हिन्दी से आंचलिकता प्रभावित हुई है और आंचलिकता ने हिन्दी को प्रभावित किया है।
हिन्दी लेखक निरंजन महावर ने कहा कि हिन्दी किताब पढ़ने और खरीदने वालों की संख्या कम हुई है। सम्प्रदायिक सोच ने हिन्दी को संर्कीण बना दिया है। हिन्दी अब लोचदार और मुहावरेदार भाषा नहीं रह गई है। आंचलिक बोलियों की तरफ झुकाव बढ़ा है। आंचलिक बोलियों के मुहावरों का प्रयोग हिन्दी में करने से कोई संकोच नहीं करते। यही सब कारण है कि हिन्दी की सम्प्रेषण शक्ति कम हुई है।
संगोष्ठी में अपने विचार रखते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक गिरीश पंकज ने कहा कि भाषाओं के बीच शब्दों का आदान प्रदान हो ,लेकिन संस्कृति नष्ट न हो, इस पर चिंतन की जरूरत है। हिन्दी के प्रति यहीं नजरिया रहा तो भाषा हासिये में चली जायेगी। हिन्दी पत्रकारिता में भी हिन्दी को तबाह किया है जिसे आने वाले पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी । वैश्विक होने की ललक हमसे अपनी भाषा को छीन रही है और धीरे-धीरे उसका जड़ कटता जा रहा है।प्रस्तुतकर्ता दिलीप जायसवाल

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

कागजो में संरक्षण, पुरात्ताविक स्थलों और स्मारकों की सुरक्षा खतरे में


छत्तीसगढ़ के संरक्षित पुरात्ताविक स्थलों तथा स्मारकों की सुरक्षा के नाम पर सिर्फ खाना पूर्ति की जा रही है। चाहे वह कभी दक्षिण कौशल की राजधानी रहे सिरपुर की बात हो या फिर सरगुजा स्थित डीपाडीह की कल्चुरी काल की प्राचीन मूर्तियों की । सरकार द्वारा पुरात्ताविक स्थलों के विकास के साथ ही उन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई । 59 स्मारकों को संरक्षित किया गया । संरक्षित करने के बाद पुरातत्व विभाग सुरक्षा के लिए केयरटेकटरों तथा दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की नियुक्ति की , लेकिन सुरक्षा भगवान भरोसे है। इन संरक्षित स्मारकों में जाकर इसे और अच्छे से जाना जा सकता है।
पुरात्ताविक स्थलों की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा अभी तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया जा सका है। यह जरूर है जब सिरपुर, कान्केर,बिलासपुर,अम्बिकापुर , मल्हार से मूर्तियों की चोरी शुरू हुई और पता चला कि इसमें अंतर्रायीय गिरोह शामिल है तो पुलिस सक्रिय हुई । इन घटनाओं के बाद माना जा रह था कि सरकारी नुमाईदें गंभीर होंगे लेकिन ऐसी स्थिति दिखाई नहीं दी है। जब 59 स्मारकों की सुरक्षा का जिम्मा पुरातत्व विभाग ने लिया तब तक डेढ़ दर्जन मूर्तियों की चोरी हो चुकी थी । इनमें से कुछ मूर्तियां तो मिल गई लेकिन शेष मूर्तियों का कोई पता नही चला। सुरक्षा के लिए विभाग द्वारा हर साल 30 लाख रूपए खर्च करने की योजना बनाई गई है।सुरक्षा के लिए 22 केयरटेकरों तथा 68 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ये कर्मी सुरक्षा की दृष्टि से सफल नहीं दिखाई दे रहे हैं।
सिरपुर की बात करें तो यहां की सुरक्षा भगवान भरोसे है। यह जरूर है कि लक्ष्मण मंदिर से मूर्ति चोरी होने के बाद सर्तकता बरती जा रही है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि सिरपुर स्थित पुरात्ताविक स्मारक कई स्थानों में दूर-दूर पर है । इसके कारण सुरक्षा कर्मी भी मानते हैं कि दिन में तो किसी तरह वे संभाल लेते है लेकिन रात में पूरी सुरक्षा संभव नहीं होती । सूत्रों की माने तो मूर्तियों का चोर गिरोह अभी भी सक्रिय है और उसकी नजर सिरपुर में खुदाई से निकले प्राचीन बेस कीमती मूर्तियों पर है। चोर गिरोह की सक्रियता खुदाई में मिले बौध्द स्तुप के बाद और भी बढ़ गई है। आसपास के लोगों की बात माने तो यहां से कई मूर्तियां चोरी हुई हैं लेकिन वे सरकारी फाईलों में दर्ज नहीं हुए हैं। यहां रेस्टहाऊस के पास स्थित पुरात्ताविक स्मारक की सुरक्षा के नाम पर लगे लोहे के ग्रील को फांदकर कोई भी अंदर जा सकता है। इसकी सुरक्षा मध्यप्रदेश जमाने के पुरात्तत्व विभाग का एक बोर्ड कर रहा है। सिरपुर के पुरात्ताविक स्मारकों को सुरक्षित कर पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने 70 लाख रूपए की मंजूरी मिल चुकी है। इसके तहत पुरात्ताविक संग्राहल का निर्माण किया जायेगा। गौरतलब है कि सिरपुर में पहली खुदाई सन् 1953-54 में सागर विश्वविद्यालय के पुरातत्व विद डॉक्टर एम.पी.दीक्षित के नेतृत्व में हुआ था वहीं अभी पिछले तीन वर्षो में 32 टीलों की खुदाई हुई है।बताना लाजिमी होगा की सुरक्षा का अभाव होने के कारण यहां की खुदाई के लिए पुरातत्वविद्वो द्वारा अनुमति नहीं दी जा रही थी । अब जब खुदाई चल रही है इसके बाद भी सुरक्षा पर कई प्रकार के सवाल उठने लगे हैं।
राज्य के उत्तर में स्थित सरगुजा जिले के डीपाडीह में कल्चुरी काल की सैकड़ों मूर्तियां बिखरी हुई पड़ी है। वहीं महेशपुर,देवगढ़ की मूर्तियों की सुरक्षा व संरक्षण भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। महेशपुर में शिव मंदिरों का भगन्नावेश भी असुरक्षित है । देवगढ़ की मूर्तियों को स्थानीय कलाकारों द्वारा विकृत किया जा रहा है। वहीं सरगुजा में ही स्थित जोगीमारा में मिले शैलचित्र लगातार नष्ट हो रहे हैं। रामगढ़ से कई मूर्तियां चोरी हो चुकी हैं। कईयों की रिपोर्ट भी पुलिस के पास नहीं है उसके बाद भी ना तो स्थानीय प्रशासन और न ही सरकार इस दिशा में गंभीरता से पहल कर रही है। सरगुजा प्रशासन ने डीपाडीह तथा दूसरे स्थलों से लाकर जिला मुख्यालय अंबिकापुर में दर्जनों मूर्तियों को कलाकेन्द्र में संरक्षित करने का प्रयास किया था लेकिन यहां से मूर्तियां गायब हो गई । यही नहीं अब तो कलाकेन्द्र का आस्तित्व ही खत्म हो गया है।
सिर्फ पर्यटन के विकास और कागजों में संरक्षण की बात करने से ही ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रख पाना आसान नहीं दिखता। सरकार को पुरात्ताविक स्मारको तथा स्थलों की सुरक्षा के लिए गंभीरता से कदम उठाने की जरूरत है नहीं तो छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक गाथा को समेट कर रख पाना सहज नहीं होगा।
प्रस्तुतकर्ता दिलीप जायसवाल

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

औद्योगिक विकास बना अभिशाप, हवा और पानी में जहर

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तथा आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण की समस्या लोगों की जान पर बन आई है। हवा और पानी लगातार प्रदूषित होती जा रही है। लोगों को कई प्रकार की बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। सिलतरा सहित दूसरे औद्योगिक क्षेत्रो में रहने वाले लोगों की हालत प्रदूषण के कारण लगातार बदहाल होती जा रही है और सरकार कुंभकर्णी नींद में सो रही है। मध्यप्रदेश से विभाजित होकर छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद से यहां विकास के नाम पर उद्योगों की स्थापना तेजी के साथ हुई है। रायपुर के आसपास तेजी से स्पंज आयरन तथा दूसरी फैक्ट्रियां खुली, लेकिन प्रदूषण को लेकर कोई ध्यान नहीं दिया गया। अधिकारी तथा नेता सिर्फ बात ही करते रहे और हालत अब बिगड़ चुका है। रायपुर शहर की बात करें तो यहां सांस लेना भी खतरे से खाली दिखाई नहीं दे रहा है। लोग इससे बचने के लिए चेहरे पर स्कार्फ बांधने के लिए मजबूर है। पेयजल भी प्रदूषित हो चुका है, लोगों को कई बिमारियायॊ का शिकार होना पड़ रहा है। सांस के मरीजो की संख्या तो दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। मौसम में भी प्रदूषण का प्रभाव दिखाई देने लगा है। वायु प्रदूषण तथा जल प्रदूषण घनकचरा प्रबंधन का अभाव शहरों में मल निकासी मार्ग नहीं होने से भू-जल प्रदूषण पर कोई चिंता नहीं की जा रही है। राज्यपाल ने छह माह पूर्व औद्योगिक क्षेत्र सिलतरा का दौरा किया था और प्रदूषण को लेकर चिंता जताई थी। अधिकारियों को इस ओर गंभीरता से ध्यान देने का निर्देश भी दिया गया, लेकिन सिर्फ खानापूर्ति ही हो पाई। उस समय उद्योगों में ईएसपी का उपयोग नहीं किये जाने की बात सामने आई थी इस पर भी राज्यपाल ने नाराजगी जताई थी। दुर्भाग्य की बात है कि इसके बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ है। ईएसपी के उपयोग से बिजली की खपत यादा होती है जिसके कारण उद्योग ईएसपी का उपयोग नहीं करते। सूत्रों की माने तो अभी भी उद्योगों द्वारा ईएसपी का उपयोग नहीं किया जा रहा है। पर्यावरण तथा उद्योग विभाग के अधिकारियों की माने तो उनके द्वारा उद्योगों को प्रदूषण पर गंभीर होकर ईएसपी का उपयोग करने निर्देश दिया गया है। सिलतरा औद्योगिक प्रक्षेत्र के सात-आठ गांव प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित है। प्रदूषण के कारण धान तथा दूसरी फसलें भी नहीं हो पा रही है। प्रदूषण इस तरह बढ़ गया है कि सुबह तक कार्बन की एक परत घरों में बन जाती है। वहीं दिनभर घर से बाहर रहने वाले लोग जब घर लौटते है तो चेहरे में भी कार्बन की परत दिखाई देती है। खेत मे लगे धान की बालियों में अंदर कार्बन भर जाता है। यह सब सरकार को भी मालूम है लेकिन सरकार भी अधिकारियों के सामने घुटने टेक चुकी है। वहीं अधिकारियों की माने तो वे सख्ती से कार्यवाही करते है तो नेता मंत्रियों का फोन घनघनाने लगता है। उन्हें धमकियां मिलनी शुरु हो जाती है। सिलतरा निवासी राजेश साहू का कहना है कि उनकी जिंदगी नरक बन गई है। प्रदूषण के कारण उनकी जिंदगी भी काले धुंए की तरह हो गई है। राजेश कहता है कि उसके आसपास के गांव के लोगों ने उद्योगों के लिए जमीन देकर बहुत बड़ी भूल की। वे चाहते है कि अब किसी भी गांव के लोग उद्योगों की स्थापना का पुरजोर विरोध करें नहीं तो उद्योग लग जाने के बाद वही हाल होगा जो सिलतरा प्रक्षेत्र में रहने वाले लोगों की है। राज्य में बिजली घरों की स्थापना के कारण प्रदूषण की समस्या और गंभीर हुई है। यह अलग बात है कि लोगों को भरपूर बिजली मिल पा रही है। कोरबा क्षेत्र में पावर प्लांट के कारण जल तथा वायु प्रदूषण दोनों ही गंभीर स्थिति में पहुंच गई है। केन्द्रीय प्रदूषण मंडल ने सन् 2006 में रिपोर्ट जारी किया था कि राय के रायगढ़ कोरबा और रायपुर में आर.एस.पी.एम. अर्थात वायु में मौजूद वो कण जो सांस के द्वारा शरीर के भीतर प्रवेश कर जाते हैं, इनका स्तर काफी बढ़ चुका है। प्रस्तुतकर्ता‍‍ दिलीप जायसवाल

शनिवार, 24 जनवरी 2009

सरगुजा में नक्सलियों से ज्यादा आतंक हाथियों का ,सैकड़ों परिवारों का आशियाना उजड़ा

वे तूफान की तरह आते हैं और तबाही मचाकर निकल जाते हैं। पीछे छोड़ जाते हैं कुचले हुए कराहते इंसान और बरबाद फसल। आए दिन का आलम बन गया है। 1988 के सितम्बर महीने में शुरू हुआ जंगली हाथियों के आतंक का सिलसिला बीस साल बाद भी लगातार जारी है। जशपुर के जंगलों से होता हुआ जंगली हाथियों का दल पहली बार कुसमी इलाके में पहुंचा था। धीरे-धीरे इसने अपने आतंक क्षेत्र का विस्तार कर लिया। अविभाजित मध्यप्रदेश के सरगुजा एवं रायगढ़ को आतंकित करने वाला जंगली हाथियों का दल उत्तर छत्तीसगढ़ के पांच जिलों सरगुजा, कोरिया, जशपुर, कोरबा एवं रायगढ़ में अपने आतंक क्षेत्र का विस्तार कर कारण का पर्याय बन चुका है। सरगुजा की एक बड़ी आबादी के लिए ये काल बन गये हैं। बीस साल पहले शुरू हुआ हाथियों का आतंकी खेल बदस्तूर जारी है। आगमन के शुरूआती दौर में कौतूहल के केन्द्र इन हाथियों से पीछे छुड़ाने का कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा है। कौतूहल बनकर आए ये मेहमान तबाही का मंजर बन गये हैं। इन बीस वर्षों में हाथियों ने सैकड़ों जानें लेकर हजारों घरों को तबाह किया है। करोड़ों रूपये की फसल बरबाद किया है। जिले का वन विभाग हाथियों की समस्या से निजात दिलाने लगतातार दो दशकों से प्रयोग करते रहा है। हाथियों की पहली खेप कुसमी क्षेत्र को हलाकान करने के बाद बरसात में अपने स्थाई ठिकाने लौट गये थे। दूसरे वर्ष हाथियों ने कुसमी के साथ-साथ राजपुर एवं धौरपुर, लुण्ड्रा क्षेत्र में अपने आतंक का विस्तार किया। साल-दर-साल इनकी आवा-जाही जारी रही। आतंक क्षेत्र का विस्तार होते रहा। आज इन हाथियों से तकरीबन पूरा जिला ही नहीं पूरा संभाग आतंकित है। मानवीय छेड़छाड़ और धान, महुआ शराब के प्रति इनकी रूचि इतनी बढ़ गई है कि पिछले महीने हाथियों का एक दल जिला मुख्यालय के मायापुर मुहल्ले में अपनी उपस्थिति बताकर शहरी लोगों को भी सावधान रहने चेतावनी दे डाला है। पहली बार 18 हाथियों के दल ने यहां के लोगों को अपनी दबिश का शिकार बनाया था। ग्रामीणों के घरौंदे उजाड़ना और खड़ी फसल को रौंद डालना इनका शगल था। गलती से भी कोई व्यक्ति इनके सामने पड़ा उसकी मौत तय है। हाथियों के दल तो बदलते गये, लेकिन इनका शगल नहीं बदला। दिन में आबादी से अलग जंगल-पहाड़ के बीच अठखेलियां और आराम। शाम ढलते ही बस्ती में उतर कर घरों को तोड़ना और उसमें रखे धान, महुआ को खा जाना। धान इन्हें ज्यादा पसंद है। धान में भी सुगंधित धान विशेषकर जीराफूल खास पसंद है। गांव की लूट एवं तबाही के बाद धान के खेत खाना, उखाड़ना, रौंदना इनका दूसरा शगल बन गया है। यही कारण है कि हाथियों का दल हर साल धान के पकने के पहले यहां हाजिर हो जाता है। 1989 में तत्कालीन राज्य सरकार की पहल पर केन्द्र के वन महानिरीक्षक और बंगाल, अविभाजित बिहार, तमिलनाडू एवं अविभाजित मध्यप्रदेश के वन अधिकारियों ने विचार-विमर्श कर प्रशिक्षित हाथियों के सहयोग से इन्हें इनके रास्ते वापस करने की योजना बनाई। तब तक एक साल में हाथियों ने चालीस लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस दौरान सरकार ने दस लाख के मुआवजा भुगतान किया था। इस दौरान हाथियों से तबाह लोगों को मुआवजा देने लम्बी प्रक्रियाओं से गुजरना होता था। जनवरी 1990 में तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक पी.एन. लाड, कर्नाटक ने हाथी विशेषज्ञ प्रभाकरन के साथ हाथियों से प्रभावित इलाके का दौरा कर इन हाथियों को प्रशिक्षित हाथियों के सहारे एक सीमांकित वनखण्ड में घेरने की योजना बनाया। पन्ना बांधवगढ़ एवं कान्हा नेशनल पार्क से प्रशिक्षित तीन हाथी बुलाकर जंगली हाथियों को कुसमी एवं सन्ना वनपरिक्षेत्र के 75 वर्ग किलोमीटर में इन्सीलेटर की सहायता से तीन एवं छह फीट की ऊंचाई पर जीआई तार की फेंसिग के भीतर घेरने की तैयारी की गई। एनरजाइजर के माध्यम से तार में आठ हजार बोल्ट का विद्युत करंट प्रति एक सेकेण्ड के अंतराल में किया गया। इस उक्ति से कई हाथी तो जंगल के दायरे में रूके रहे, लेकिन एक दंतैल हाथी ऊपर के तार को दांत से उठाकर नीचे के तार से नाखून से दबाकर बाहर निकल जाता था। बाद में प्रशासन की यह उक्ति भी फेल हो गई और दंतैल के सहयोग से सारे हाथी अपने मार्ग पर वापस हो गये। हाथियों का दल नियमित रूप से आने लगा और अपने कैम्प की अवधि के साथ-साथ तबाहियों का सिलसिला भी बढ़ाते गया। ग्रामीणों के विरोध के आगे प्रशासन ने फिर से एक बार हाथियों को पकड़ने योजना बनाई। प्रदेश स्तर पर कर्नाटक के एक विशेषज्ञ टीम को इस कार्य का जिम्मा सौंपा गया। शहर के निकट रायगढ़ मार्ग पर लालमाटी के जंगलों में छिपकर गांवों में लूटपाट एवं बरबादी की कहानी लिखने वाले हाथियों को पकड़ने लालमाटी में बेस कैम्प बनाकर पकड़ने का सिलसिला शुरू हुआ। कर्नाटक की इस टीम में दो पशु चिकित्सक, एक एसीएफ एवं 6 प्रशिक्षित हाथी एवं महावत थे। टीम का विशेषज्ञ हाथियों की स्थिति एवं दूरी बताता। इस आधार पर एक निश्चित दूरी से औषधीय प्रभाव वाले टें्रकुलाजर गन के सहारे एक जंगली हाथी पर शूट की जाती। इंजेक्शन लगते ही हाथी चिंघाड़ता और बेहोश होने लगता। बेहोश हाथी को प्रशिक्षित हाथियों को दोनों ओर सहारा देकर बंधन के साथ बेस कैम्प में लगाया जाता था, फिर उपचार कर इस बेहोश हाथी को ठीक कर दिया जाता। यह हाथी तब तक जंजीरों में जकड़ दिया जाता था। बेहोशी के दौरान हाथी को प्रशिक्षित हाथियों द्वारा पानी से लगातार नहलाया जाता था, ताकि उसके शरीर का तापमान संतुलित रहे। इस दौरान इस टीम ने उस साल आए 13 हाथियों को यहां तथा 4 को जशपुर के जंगल में जंजीरों से जकड़ दिया। मौत का खौफ दिखाने वाले इन हाथियों का पकड़ाना और जंजीरों में जकड़ जाना लोगों के कौतूहल का कारण बना रहा। वहां इस चमत्कार को देखने भीड़ लगी रही। 2003 में ही हाथी विशेषज्ञ पार्वती बरूआ के नेतृत्व में जशपुर में हाथियों को पकड़ने का प्रयोग किया जा चुका था, जिसमें एक हाथी पकड़ा गया और अठारह दिनों में ही मर गया। हाथी के मरने पर प्रदेश सरकार ने पार्वती बरूआ के साथ अपने अनुबंध को समाप्त कर उन्हें वापस भेज दिया। इन प्रयोगों के बाद भी हाथियों के दल पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। तेज स्मरण शक्ति एवं बेहद बुद्धिमान इस परिवार के दूसरे सदस्य आते रहे और अपने अतिक्रमण क्षेत्र का विस्तार करते रहे। आने वाली टीमें बदल जाती हैं या फिर उसमें दूसरे सदस्य शामिल होते जाते हैं। आज 122 हाथियों का दल पांच दलों में बंटकर इन प्रभावित जिलों में लूटपाट एवं आतंक पैदा कर रहा है। इनमें से लगभग पचास हाथियों के तीन दल जिले में भ्रमण कर सरगुजा जिले को अपने प्रभाव क्षेत्र में कैदकर रखे हैं। पिछले चार सालों में हाथियों ने 47 लोगों को कुचल डाला है। सामान्य धारणा है कि जंगल का बेतहाशा सफाया जीव-जंतुओं को विचलित कर रहा है। ये जंगली हाथी झारखड के सिंहभूमि और लातेहार जिला के बेतला नेशनल पार्क और उड़ीसा में झारसुगुड़ा से होते हुए जशपुर या सरगुजा में प्रवेश करते हैं। बेतला राष्ट्रीय उद्यान चोरी-छिपे जंगलों की बेतहाशा कटाई एवं खदानों के विस्तार से अब सिर्फ नाम का उद्यान रह गया है। हाथियों का प्राकृतिक आवास और उदरपूर्ति का क्षेत्र लगभग समाप्ति की ओर है इसलिए हाथी सरगुजा में घुस रहे हैं। सिंहभूमि के हाथी भी इन्हीं कारणों से झारसुगुड़ा होकर यहां अपना रहवासी क्षेत्र खोजने आ रहे हैं। स्थानीय जंगलों में इन हाथियों को कुछ सुकून मिल रहा है इसलिए यहां ये बार-बार दस्तक दे रहे हैं। जिले में अवैध कटाई, बस्तियों का अतिक्रमण एवं वनभूमि अधिकार पत्र पाने की होड़ में जंगल रातों-रात साफ हो रहे हैं। इन्हीं कारणों से हाथियों का दल अब मानवीय बस्तियों से भी गुरेच नहीं कर पा रहा है। आसानी से उपलब्ध भोजन का अनाज और फसल तथा मदमस्त कर देने वाला महुए के अम्यस्त हो गये हैं। इतना सबकुछ होने के बाद भी राज्य एवं केन्द्र की सरकारें समस्या को नजर अंदाज कर रही हैं। आज तक इस समस्या के स्थाई समाधान के विषय में सोचा ही नहीं गया। इतनी जानें चली जाने की घटना को एक सामान्य दुर्घटना मानकर जनप्रतिनिधि सिर्फ मुआवजा देने की बात कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। हालांकि सेमरसोत, तैमोर पिंगला एवं बादलखोल अभ्यारण्यों को एलिफेंन्ट कारीडोर बनाने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा जा चुका है, किन्तु इतने बड़े मुद्दे के प्रति राज्य एवं केन्द्र सरकार को जिस संवेदनशीलता एवं तत्परता का परिचय देना चाहिए वह कहीं दिखाई नहीं दे रही। इस समस्या का स्थाई समाधान तत्काल किया जाना चाहिए, जिसमें हाथियों एवं बस्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। हाथियों ने जीता आस्कर पुरस्कार अपने स्थाई रहवास क्षेत्र के साथ गंभीर छेड़छाड़ के बाद जिले में आकर आतंक मचाने वाले हाथी भले ही कई परिवारों को बरबाद करने का बदनुमा टीका अपने सर लिखवाए हों, लेकिन इन्हीं हाथियों की बदौलत न्यूनतम खर्च एवं समय में बनी एक फिल्म को विश्व का सर्वश्रेष्ठ आस्कर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1993 में लालमाटी के जंगलों में जब इन जंगली हाथियों को पकड़ा जा रहा था, तब माइक पाण्डेय अपने कंधे पर वीडियो कैमरा टांगे अपने दो महिला सहयोगियों के साथ इस दृश्य का फिल्मांकन कर रहे थे। द लास्ट माइग्रेशन नाम से बनी इस फिल्म को अभूतपूर्व सफलता मिली। शुरूआती दौर में विश्व के 28 देशों में इसे प्रदर्शित किया गया। हर देश में सराही गई इस फिल्म को बाद में 56 देशों में प्रदर्शित किया गया। इस फिल्म को 7 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों के साथ-साथ अनेक देशी पुरस्कार प्राप्त हुए। इस फिल्म के बाद माइक पाण्डेय अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पर्यावरण विशेषज्ञ के रूप में स्थापित हो गये हैं और इस दिशा में अनेक महत्वपूर्ण काम कर चुके हैं। इस दिशा में उनका प्रयास आज भी जारी है। सरगुजा के अमलेन्दु मिश्र ने एक चिंतन के साथ इस फिल्म के फिल्मांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस फिल्मांकन के बाद श्री मिश्र भी पर्यावरण, वन्य जीवों के अध्ययन एवं फिल्मकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। श्री मिश्र का स्थान विश्व के चार प्रमुख वन्य जीव फिल्मकारों में भी माना जाता है। वर्ष 2004 में अमलेन्दु मिश्र एवं माइक पाण्डेय ने एक बार फिर मिलकर जशपुर में विलुप्त होते महाकाय पर वैनेशिंग जाइन्टस नाम से दूसरी फिल्म बनाई, जिसे दूसरा आस्कर पुरस्कार प्राप्त हुआ। अमलेन्दु मिश्र द्वारा इस फिल्म के फिल्मांकन से ज्यूरी के सदस्य अत्यधिक प्रभावित हुए।हाथियों की जीवनचर्याइन जंगली हाथियों की जीवनचर्या से जुड़ी अनेक बातें काफी रूचिकर हैं। हाथियों का परिवार मातृ प्रधान होता है। इनका समूह रक्षक युवा बलशाली हाथी होता है, जबकि आदेश हथिनी का चलता है। हथिनी समूह रक्षक का चयन करती है। समूह रक्षक बनने प्राय: लड़ाई होती रहती है। हमेशा समूह रक्षण बलशाली के ही हाथ में होता है। समूह रक्षक रात के अंधेरे में अकेले निकलकर भोजन, पानी एवं पड़ाव की खोजकर विशेष अल्ट्रासोनिक वायस से दल को सूचना देता है या जाकर दल को साथ लाता है।हथिनी का गर्भकाल 22 से 26 माह का होता है। हथिनी किसी जल स्त्रोत के निकट ही बच्चे को जन्म देती है। प्रसव के दर्द के दौरान वह चिंघाड़ती है और दल की दूसरी हथिनी जलस्त्रोत से सूंढ़ में पानी भरकर उसे बच्चा होने तक नहलाते रहती हैं। प्रसव होने पर थैली में लिपटे फुटबाल की शक्ल के शावक को पहले फुटबाल की तरह लुढ़काती हैं, जिससे ऊपर की झिल्ली फट जाती है। झिल्ली साफ करने के बाद बच्चे को सूंढ़ के पानी से नहलाकर सूंढ़ पर उठाकर बच्चे को जंगल में ले जाते हैं। बच्चे को हाथियों का दल हमेशा सुरक्षा घेरे में रखता है। हाथियों का वजन पांच से सात टन का होता है और उम्र औसत डेढ़ सौ साल की। चौबीस घंटे में वह तीन-चार घंटे ही सोता है, जबकि जगे रहने पर वह पूरे समय तक खाते रह सकता है। चौबीस घंटे में मौसम के अनुसार एक या दो बार पानी पीता है तथा सामान्य तौर पर 10 से 15 गैलन पानी पी जाता है। एक वयस्क हाथी तीन-चार क्विंटल चारा लेता है। गर्मी लगने पर वह सूंढ़ के सहारे पेट के भीतर का पानी खींचकर शरीर पर छींटता है। हाथी एक विशेष प्रकार का अल्ट्रासोनिक वायस निकालकर दल के दूसरे साथियों को दिशा एवं दूरी सहित संभावित खतरे की जानकारी देता है। हाथियों में बला की एकजुटता होती है। आज भी कायम है आखेट परम्परासरगुजा के जंगलों में वन्य जीवनों की समृद्ध परम्परा रही है। अलौकिक सुन्दरता को अपनी ओट में समेटे अंचल के वनखण्ड जल के प्राकृतिक श्रोत, पहाड़ और उनके बीच जंगल की समृद्ध परम्परा आज भी बरबस किसी को भी आर्पित कर लेती है। इस घनघोर जंगलों में रियासती काल में राजा-महाराज और अंग्रेज अधिकारी तो शिकार खेलते ही थे, आजादी के बाद एवं राजनेताओं अविभाजित मध्यप्रदेश के कई अधिकारियों को खुश करने यहां शिकार पर आमंत्रित किया जाता था। नगर सहित जिले के अभिजात्य वर्ग के कुछ लोग आज भी शिकार पर निकलते हैं। शिकार खेलना इनका शगल है। यही कारण है कि आजादी के बाद तक जंगलों में बरबस दिख जाने वाले शेर, चीते, हिरण, मृग और कोटरा यहां से गुम हो गये हैं। अब जंगली सूअरों की संख्या भी तेजी से घटते जा रही है। गन्ने के दीवाने जंगली सूअर अब शिकारियों के शौक का कोपभाजन बनते जा रहे हैं। सरगुजा रियासत के तत्कालीन शासक महाराज रामानुज शरण सिंहदेव एक चर्चित विश्वस्तरीय शिकारी थे। वे न केवल मध्य प्रान्त और पूरे देश के जंगलों में अपितु अफ्रीका के जंगलों तक शिकार खेल चुके थे। उन्होंने ग्यारह सौ से अधिक शेरों का शिकार करने का विश्व रिकार्ड कायम किया है। शिकारियों के शगल से समाप्त वन जीवों की पूर्ति तो अब नहीं हो सकती, लेकिन अब भी बची धरोहर को बचाने ईमानदार प्रयास की जरूरत है। जिले के जंगलों से भालू एवं बंदरों की जनसंख्या पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ृा है। इसका प्रमुख कारण यह हो सकता है कि भालू एवं बंदर का मांस नहीं खाया जाता इसलिए इनके शिकार के प्रति लोगों की रूचि नहीं है। खाल या नाखून के शौकिनों द्वारा कभी कभार भालू मारने या भालू के आतंक से प्रभावितों द्वारा जहर देकर भालू मारने की शिकायतें मिलती रही है। बेघर हाथियों का घर बना सरगुजायह जानकर लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि कभी सरगुजा के घनघोर जंगल हाथियों के लिए महफूज हुआ करते थे और यहां भारी तादाद में हाथी रहते थे। मुगल सल्त्नत के सुल्तान अपने जरूरतों के लिए हाथी सरगुजा से भी प्राप्त करते थे। कहते हैं कि नगर के श्रीगढ़ में सरगुजा रियासत के शासक हाथियों को रखते थे। यहां प्रशिक्षित महावतों की समृद्ध परम्परा रही है। कई महावत हाथियों के साथ दूसरे क्षेत्रों में भेजे गये या चले गये। आज भी महामाया मंदिर के निकट इस परम्परा के साक्षी कई परिवार निवासरत हैं। सन् 1440 में मालवा का सुल्तान महमूद खिल्जी हाथियों की खोज में सरगुजा की ओर निकला। वह रास्ता भटककर बांधोगढ़ पहुंच गया। बांधोगढ़ में उसकी भेंट ऐसे लोगों से हो गई जो सरगुजा से हाथी लेकर आये थे और महोरा जा रहे थे। उन दिनों बाधोगढ़ के हाट में हाथी बिका करते थे। सुल्तान ने हाथियों की खोज में अपने एक सिपहसलार को सरगुजा भेजा और आसपास के कई स्थानीय सामंतों से सम्पर्क साधा। उसने शादियावाद मांडू लौटने से पहले सरगुजा से पथस हाथी प्राप्त कर लिए। तत्कालीन सरगुजा रियासत ने प्रतिवर्ष उसे दस हाथी नजराने में भेजने वचन दिया। मध्यकालीन युव की लड़ाईयों में हाथियों को शक्ति के एक अति महत्चपूर्ण प्रतीक के रूप में देखा जाता था। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक घनघोर जंगल के रूप में पहचाने जाने वाले सरगुजा के जंगल आबादी के बढ़ते घनत्व एवं सरकारी नीतियों के कारण सिमटते गये। हाथी तो पहले ही यहां से भाग निकले थे या भगा दिए गये थे। कहते हैं कि हाथियों की स्मरण शक्ति बहुत तेज होती है। यही कारण है कि वे अपना रास्ता नहीं भूलते और अपने पुरखों के समृद्ध वन साम्राज्य को तहस-नहस करने वालों की खबर लेने साल-दर-साल लगातार दस्तक दे रहे हैं।
जंगली हाथियों की तबाही से डरे-सहमे लोग अपनी जान बचाने रतजगा कर रहे हैं। गांव के स्कूल भवन एवं पंचायत भवन में अपनी रातें गुजार रहे हैं। एक तरफ हड्डियां कंपा देने वाली ठंड दूसरी तरफ मौत का खौफ देखते ग्रामीण अपने बच्चों को बचाने बेबस नजरों से रहनुमाओं की खोजकर रहे हैं। गाड़ियों से उतरकर तबाहियों के आकलन के लिए आने वाले अधिकारियों की तरफ ये बेबस इंसान रोज नई आशाओं का भ्रम पाल कर रातें गुजार रहे हैं। अधिकारी उन्हें हाथियों से दूर रहने का पुराना जुमला पढ़ाकर विदा हो लेते हैं। इतनी बड़ी समस्या में रातें गुजारने वालों की तस्वीर शायद हमारी सरकार या राजनेताओं तक नहीं पहुंच सकी है या पहुंची है तो राजनेता और सरकार इस मामले के प्रति गंभीर नहीं हो रहे हैं। बरवादियों से उजड़े परिवार को मुआवजा का मसाला चटाकर यथा स्थिति में सब के जीने का अधिकार कायम रहे इस सोच से अलग कुछ नहीं हो सका है। स्थिति को देखकर लगता है कि समस्या के निराकरण में बरबादियों के बदले मुआवजा देने से अधिक कुछ भी नहीं हो सकता। दो दशकों से बरबादी की कहानी से साक्षी इस जिले के ग्रामीणों की चिंता इसके जनप्रतिनिधियों से लेकर राज्य सरकार तक को नहीं है अन्यथा कोई तो पूछ-परख करता। मुआवजा देने से अलग स्थाई हल की बात सुझाता। आश्चर्यजनक है कि राज्य की विधानसभा में जनप्रतिनिधियों ने अपने प्रश्नों में प्रभावित के मुआवजे से अलग इस सम्बन्ध में कुछ विशेष नहीं जानना चाहा है। उन्होंने अपने क्षेत्र में मुआवजा वितरण की बात को प्रमुखता से उठाया है। ग्लोबल टाइगर फोरम के महासचिव एवं हाथी परियोजना के पूर्व निदेशक एस.सी.डे के अनुसार 1989 में वन्य जीव संस्थान देहरादूर में आयोजित सेमिनार में यह जानकारी दी गई थी। सिंहभूमि के वेतला राष्ट्रीय उद्यान से जंगली हाथी विस्थापित होकर पश्चिम बंगाल के मिदानापुर एवं सरगुजा जंगलों में आए थे। श्री डे ने बताया कि उनके अध्ययन में सत्तर साल के अंतराल में हाथी नहीं आए हैं। अस्सी के दशक में पहली बार हाथी पहली बार सरगुजा आए। उनकी नजर में इस समस्या का हल आवश्यक है जो दृढ्ता से लेना होगा। इस हल में जनता, जनप्रतिनिधि, सरकार की सहमति से ही हल निकाला जा सकता है जो अत्यंत मालूम पड़ता है। क्षेत्र के किसी बड़े सुरक्षित वनखण्ड में हाथियों के बड़े दल को रखने की योजना बनाई जा सकती है। छोटे दलों में बंटे हाथियों को खदेड़कर या फिर पकड़कर इस समस्या का हल ढूंढा जा सकता है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नजर नहीं आता। हाथियों को पकड़ने के लिए कर्नाटक सरकार से ही मदद मिल सकेगी क्योंकि कर्नाटक में ही हाथियों के विशेषज्ञ हैं। कनार्टक सरकार से हाथियों को पकड़ने विशेषज्ञों की मांग प्रदेश एवं केन्द्र सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति पर ही निर्भर करेगा। हाथियों के पकड़ने पर अत्यधिक व्यय आने की सम्भावना है। उन्होंने बताया कि 1993 में एक हाथी को पकड़ने में 85 से 90 हजार रूपये का खर्च आया था, जो आज की स्थिति में पांच से छह लाख रूपये हो सकती है वह भी तब जब कर्नाटक से विशेषज्ञ उपलब्ध हो जाएं।हाथियों का उपयोगराजघरानों के ध्वस्त होने के बाद हाथी पालने का शौक जमींदारों ने पाल लिया। हाथी से उनके समृद्धि की पहचान उनके इलाके में होती थी, लेकिन आज हाथियों के ऊपर बढ़ते खर्च के आगे सबने हाथ उठा लिए। नये दौर में यह न तो शौक का सवारी रहा न समृद्धि की पहचान। नये दौर में हाथी-हाथी पालने का जुमलाभर रह गया है। आज हाथियों का उपयोग पर्यटन, अभ्यारण्यों की चौकसी एवं लकड़ी से जुड़े कारोबार में ही किया जा सकता है। देश में आज इनकी संख्या 28 से 30 हजार है, जबकि 1980 में इनकी जनसंख्या 12 हजार थी। सोनपुर मेले में 1965 में 5 हजार में बिनके वाले हाथी की कीमत बढ़कर आज पांच से छह लाख हो गई है। सिंहभूम में अभ्यारण्य के किनारे खुले खदानों से निकलने वाले पानी के जहरीले प्रभाव से हाथियों के बच्चे मरने लगे। इससे हाथियों ने अपने लिए सुरक्षित स्थान की खोज में अन्यत्र पलायन किया। पलायन स्थलों में वे अपने को सुरक्षित महसूस करने लगे। यही कारण है कि यह स्थान उका स्थाई निवास बनने लगा।
सरगुजा नामकरण में हाथियों का हाथ सरगुजा के नामकरण के पीछे हाथियों का बहुत बड़ा हाथ है। इससे ऐसा भान होता है कि सरगुजा में भारी तादाद में हाथियों की उपस्थिति रही होगी। सरगुजा शब्द सुरगज, सरगजा या स्वर गजा का विकृत रूप हो सकता है। सुरगज- जहां इन्द्रदेव के हाथी ऐरावत जैसे हाथी पाए जाते हों। सरगजा- जहां हाथियों के विशालकाय सिर ही सिर दिखते हों। स्वरगजा- जहां हाथियों का स्वर चिंघाड़ गुजता रहता हो। इस प्रकार सरगुजा नाम की व्युत्पत्ति इन शब्दों से विकृत होकर हो सकती है। ऐसी किंवदली है कि सरगुजा के जंगलों में कभी विशालकाय हाथी होते थे, जो देवराज इन्द्र के हाथी ऐरावत के सदृश्य विशाल ललाट पर सफेद चिन्ह लिए पैदा होते थे। जिले के ऐतिहासिक स्थल जिले के रामगढ़ का सम्बन्ध कालीदास के मेघदूत के नायक यक्ष से जोड़ा जाता है। इंद्र के हाथी ऐरावत ने कुबेर का बाग उजाड़ दिया था और बाग के रक्षक यक्ष को इस दण्ड स्वरूप अकेले रामगढ़ में प्रवास करना पड़ा।

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

गद्दार नेताओं को सबक सिखायेगी युवा शक्ति, सांसद भूले शहीदों को

देश के सांसदो ने उन शहीद जवानों को सात साल में ही भुला दिया जिन्होंने अपनी जान की कुर्बानी देकर संसद में हमला करने वाले आतंकियों को करारा जवाब दिया था। जवान हर रोज शहीद हो रहे हैं। ऐसे में जम्मू और काश्मीर में शहीद हो रहे जवानों को ये नेता कितना याद रखते होंगे समझा जा सकता है। पिछले माह मुम्बई हमले में हुए शहीदों को देश के सांसद भूल जायें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। ऐसे में देश के हर नागरिक को चाहिए की वह ऐसे नेताओं को सबक सिखाये और शहीदों को कभी न भूले।
दुनिया में ऐसे कम ही लोग होते है जो अपना जान बचाने वाले को भूल जाते है। इन्ही में हमारे देश के सांसद भी शामिल हो गये है। आज 13 दिसम्बर को संसद में हमले का सात साल पूरा हुआ। हमले में शहीद हुए जवानों को श्रध्दांजलि देने के लिए आठ सौ सांसदों में महज बीस सांसद ही पहुंचे। दुर्भाग्य की बात है कि इनमें देश के गृह मंत्री, विदेश मंत्री भी शामिल है। अगर ये जवान उस दिन आतंकियो से मुकाबला नहीं किये होते तो सांसदो को बंधक बना लिया गया होता और आतंकी अपनी मांग पूरी कराये होते। यह भी कोई बड़ी बात नहीं थी कि सभी सांसदो को मौत के घाट उतार दिया जाता। शायद जैसे-जैसे यह घटना पुरानी होती गई सांसद शहीद जवानों को भुल गये और सिर्फ इस हमले के बाद फांसी की सजा पाने के बाद जेल में बंद अफजल पर राजनीति करना ही याद रह गया है। देश के नेता कितने गद्दार होते जा रहे हैं वह इसी बात से समझा जा सकता है कि संसद के दो कर्मचारी भी शहीद हो गये थे लेकिन उनके परिवार के लोग मदद की दरकार लिये दर-दर की ठोकरे खा रहे है। आज जब श्रध्दांजलि के नाम पर मुठ्ठी भर सांसद मौके पर पहुंचे थे तो वहां भी वे पहुंचे थे। लेकिन वहां उनकी बात मीडिया के अलावा किसी ने नहीं सुनी । पिछले महीने हुए मुम्बई हमले की घटना के बाद भी देश के नेताओं का असली चेहरा हर किसी ने देखा। इसके बाद भी ये अपने को नहीं बदल सके। शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि कुत्ते का पुंछ कभी सीधा नहीं होता। हालात देखकर तो लगता है अगर सुभाष चन्द्र बोस जैसे देश भक्त आज अगर होते तो आजाद कहे जाने वाले भारत के इन नेताओं को सबक सिखाने से पीछे नहीं हटते। अभी भी वक्त है ऐसे नेताओं को सबक सिखाया जाये और खुद देश के लिए शहीद होने वाले जबांजो को अपना आदर्श बनाया जाये। देश की युवा शक्ति को आगे आने की जरुरत है और उसे इन नेताओं से भी सतर्क रहने की जरुरत है जो मंचो से भले ही उन्हें एक नई मंजिल की रोशनी दिखाते हैं। लेकिन लोकतंत्र के उत्सवों के दौरान इन युवाओं का किस प्रकार उपयोग होता है। अभी भी वक्त है हम संभल जाये वरना कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं होगा।

रविवार, 30 नवंबर 2008

बालको ने शिमला में घोला जहर, भूखे-नंगे आदिवासी बन रहे पहचान


छत्तीसगढ का शिमला कहे जाने वाले मैनपाट की प्राकृतिक वादियों में लगातार एक ऐसा जहर घुल रहा है जो इस शिमला के अस्तित्व के लिए कभी संकट बन सकता है। बॉक्साईट खादानों में होने वाले विस्फोटों के कारण प्रदूषण की समस्या तो वहीं जहां-तहां अवैध उत्खनन के कारण प्राकृतिक सुंदरता पर ग्रहण लग गया है। यहां के आदिवासियों के पास दो वक्त की रोटी बात तो दूर इस कड़कडाती ठण्ड में तन पर लपेटने के लिए ठीक से कपड़े तक नसीब नहीं हो रहा है।
सरकार द्वारा मैनपाट को पर्यटन के दृष्टि से विकसित करने प्रयास किया जा रहा है। पर्यटकों के रूकने के लिए होटल बनाया जा रहा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी यहां की प्राकृतिक सौंदर्य को बचाने की कोशिश नहीं की जा रही है। सबसे बड़ी बात है कि यहां 15 साल से बालकों द्वारा बॉक्साईट का उत्खनन किया जा रहा है। बालकों ने उत्खनन के लिए हजारों पेड़ों की बली चढ़ा दी। लेकिन इस कंपनी ने इन 15 सालों में एक भी पेड़ तैयार नहीं किया है। जांच में बालको को दोषी भी पाया गया लेकिन अर्थदण्ड के अलावा प्रशासन ने जिम्मेदार प्रबंधन के अधिकारियों के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं कराया । बॉक्साईट के खदानों में उत्खनन के लिए नियम कानून को ताक पर रखकर विस्फोट किये जा रहे है और प्रदूषण की समस्या बढ़ गई है लेकिन सरकार गंभीर नहीं है। अब तक बालको के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति ही हुई है। जानकारी के अनुसार बालको को आईबीएम (इंडियन ब्यूरो माइंस) तथा पर्यावरण विभाग ने मैनपाट की प्राकृतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए बॉक्साईट उत्खनन करने का लाइसेंस दिया था लेकिन इसे नजरअंदाज कर बालको तीन साल से अवैध उत्खनन करती रही। इसकी जांच आईबीएम को करनी थी लेकिन इस पर भी खानापूर्ति कर ली गई। इस मामले में बालको के साथ ही कलेक्टर भी कटघरे पर दिखे थे आईबीएम ने खुद रास्ता साफ कर दिया । बताया तो यह भी जाता है कि इसमें आईबीएम के एक बड़े की मिलीभगत थी। इसके लिए बालको को लाखों का भेंट देना पड़ा। यह मामला मैनपाट की प्राकृतिक वातावरण पर हमले से जुड़ा हुआ था। इसके बाद भी प्राकृतिक संपदा और उसकी सुरक्षा का दंफ भरने वाले संगठन चुप्पी साधे हुए हैं।
बालकों ने जहां मैनपाट की प्राकृतिक संतुलन को तहस-नहस करना शुरु कर दिया है वहीं खदानों में काम करने वाले हजारों मजदूरों को सुअरों के लिए बनाये गये बाड़े जैसे झोपड़ियों में रहना पड़ रहा है। बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे है। खदानों में तीन हजार से अधिक मजदूर काम कर रहे है और बालको प्रबंधन द्वारा मजदूरों की हित में हर साल लाखों रूपये खर्च करने का दावा किया जाता है पर सच्चाई को छुपाया नहीं जा सकता है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य की बात क्या हो सकती है कि खदानों में कई बार बच्चे भी काम करने के लिए मजबूर दिखाई देते है। बालको प्रबंधन द्वारा हमेशा से छला जा रहा है। मजदूरों का कहना है कि जब भी आंदोलन करते है तो उन्हें आश्वासन मिलता है लेकिन अब उम्मीदें नहीं है। बालको की इस रवैये का फायदा यहां के मजदूर संगठन और नेता उठाते रहे हैं। अब तो यहां तक कहा जाने लगा है कि जब मजदूर नेताओं का जेब खाली हो जाता है तो वे आंदोलन के लिए मजदूरों को उकसाते है और ऐसा आंदोलन हर माह दो माह में चलता ही रहता है। यह बताना लाजमी होगा कि मजदूर इन तथाकथित नेताओं के दलाली का शिकार हो रहे है। जब तक इन मजदूरों को सही नेता नहीं मिलेगा तब तक बालको प्रबंधन इनका शोषण करता ही रहेगा। कई बार ऐसी भी स्थिति बनती है जब मजदूरों के दिल में बालको प्रबंधन के खिलाफ विरोध की वाला भड़कती है तो वह भी दबकर रह जाती है क्योंकि मजदूर यादा दिनों तक विरोध करेंगे तो दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पायेगी। वहीं सरकार को तो बालको से यादा से यादा राजस्व चाहिए उसे मजदूरों की कराह सुनने की फुर्सत ही कहां है? मैनपाट के वातावरण में घुल रहे जहर का घातक परिणाम कभी भी भयावह हो सकता है और इसे यहां के रहने वाले माझी जनजाति को जूझना पड़ेगा। जब यहां बॉक्साईट की खदानें खुली तो आदिवासियों को सुखद अनुभूति हुई थी। लेकिन अब तो उनकी समाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित बचाये रखना मुश्किल हो गया है।
मैनपाट के बदले हालात का अंदाजा पहली बार में नहीं लगा सकता आज से दस साल पहले जो मैनपाट गया होगा वह अब जाकर वहां की बदहाली को समझ सकता है। छत्तीसगढ़ के इस अभागे शिमला में रायपाल से ही कई नेता मंत्री हमेशा जाते रहे है। शायद उन्हें यहां के भूखे, नंगे आदिवासियों को देखकर खुशी होती है और वे इसी को आदिवासियों की पहचान मानते हैं। नये साल में बड़े-बडे अधिकारी मौज-मस्ती के लिए पहुंचते है। पिछले साल भी अधिकारी मौज-मस्ती के लिए पहुंचे थे जहां बच्चों ने उनके कप-प्लेट धोये थे और जूठा खाया था। अब नया साल आने वाला है ऐसे में ऐसा फिर हो तो कोई बड़ी बात नहीं। वैसे भी अब तो यहां यह रोज की बात हो गई है।
बालको द्वारा यहां से हर रोज सैकड़ों मिट्रिक टन बॉक्साईट का उत्खनन कर परिवहन किया जा रहा है। ओवरलोड की शिकायत आम रही है। इससे यहां की सड़क खस्ताहाल हो चुका है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए यह किसी खतरे से कम भी नहीं है लेकिन बड़ी बात तो यह भी है कि नेता मंत्रियों पर पहुंच रखने के कारण प्रशासन का आदेश भी बेअसर साबित होता है। सरगुजा कलेक्टर ने बालको प्रबंधन को जर्जर सड़क को बनाने कई बार निर्देश दिये लेकिन प्रबंधन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
सवाल यह उठता है कि अगर बालको ने ईमानदारी से मैनपाट के विकास के लिए काम किया होता तो मैनपाट के सपूतों को जूठे प्लेट और जूठन नहीं खाना पड़ता। शायद यही कारण है कि जशपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जुदेव वहां बॉक्साईट का विशाल भंडार होने के बाद भी उत्खनन का विरोध करते रहे है। जब भी उनसे बॉक्साईट उत्खनन के विरोध का कारण पूछा जाता है तो उनका एक ही विचारणीय जवाब होता है कि आप मैनपाट और रायगढ़ की हालत नहीं देख रहे हैं। हम जशपुर को बदहाल नहीं बनना चाहते। श्री जुदेव का यह भी कहना है कि उद्योगों को बढ़ावा देने की जगह उसी धरती पर कृषि को उद्योग से क्यों नहीं जोड़ा जाता। चाहे जो भी हो मैनपाट का दर्द सुनने वाला कोई भी नहीं है और इस शिमला के आदिवासी प्राकृतिक संपदाओं के दोहन के बाद भी बदहाली के बीच जीने को मजबूर है। वे अपनी प्रकृति की सुरक्षा करने में बेबस और लाचार दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में जरुरत है एक ऐसे मसीहा की जो फिर से लौटा सके यहां की आबो हवा में पसीना बहाने वालों की जिंदगी में खुशहाली ताकि पर्यटकों की तरह मुस्कुराता रहे मैनपाट।
प्रस्तुतकर्ता- दिलीप जायसवाल

बुधवार, 19 नवंबर 2008

गरीबी की मार, सजा सूअर का कच्चा मांस

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले कुपोषित बच्चे सुअर का कच्चा मांस खाने मजबूर हैं। कुछ बच्चे इतने पतले हैं कि उनकी हड्डियां दिख रही है । तीन-चार साल के उम्र के अधिकांश बच्चों का पेट निकला हुआ है। गर्भवती महिलाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने की बात तो दूर उन्हें योजनाओं के बारें में कुछ भी नहीं मालूम है । लेकिन विधानसभा चुनाव प्रचार करने वाले नेताओं की नजर जानबूझकर यह हालात नहीं देखना चाहती ।
रायपुर में रईसों की कमी नहीं है । इनके बीच एक ऐसा वर्ग भी है जिसके पास न तो रहने के लिए घर है और न ही बच्चों का पेट भरने के लिए अनाज । यह जरूर है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा तीन रूपये किलों में चांवल दिया जा रहा है। रिंग रोड़ स्थित न्यू राजेन्द्र नगर के बजाज कॉलोनी के बाजू में रहने वाले झुग्गी झोपड़ी निवासी ठाकुर राम पटेल के चार बच्चे हैं और उसकी पत्नी गर्भवती है। विधानसभा चुनाव के एक दिन पहले यानी आज 19 नवम्बर की सुबह से दोपहर तक ठाकुर राम पटेल के बच्चों ने कुछ भी नहीं खाया था । सूअर का मांस उसकी मां काट रही थी और बच्चे उसे खा रहे थे । कच्चा सूअर का मांस खाने की बात किसी को सहसा यकीन नहीं होता लेकिन राजधानी के गरीबों के बीच जाकर हकीकत देखी जा सकती है।
ठाकुर राम पटेल का कहना है कि भाजपा तथा कांग्रेस वाले वोट देने के लिए शराब बांट रहे है । उससे उसका क्या होने वाला है। कम से कम उन्हें अनाज देना चाहिए ताकि वह बच्चों का पेट पाल सके। वह दिन भर कबाड़ का काम करने के बाद भी इतना नहीं कमा पाता कि दोनों वक्त की रोटी बच्चों को खिला सके। उसकी झोपड़ी में कांग्रेस और भाजपा दोनों का चुनावी झण्डा लहरा रहा है। वह कहता है कि दोनों पार्टी के लोग झण्डा लगाकर चले गये हैं, लेकिन किसी ने उनका दर्द समझने की कोशिश नहीं की ।
प्रस्तुतकर्ता-दिलीप जायसवाल

शनिवार, 1 नवंबर 2008

भगवान ने उसके लिए बंद कर ली है आंख

कहते है कि भगवान के करीब रहने वालों पर कोई आंच नहीं आती। यही कारण है कि लोग मंदिर और मस्जिद जाया करते है। लेकिन अगर कोई अपनी जिंदगी का महत्वपूर्ण पल मंदिर में गुजार दे और जब उसका शरीर जवाब दे तो उसे आसियाना की बात तो दूर दो वक्त की रोटी ही नसीब न हो। इसे क्या कहा जाये?
राजधानी रायपुर स्थित लाखेनगर भोईपारा स्थित भवानी मंदिर में शांति नामक एक महिला अपने पति के साथ तब तक काम की जब तक उसके हांथ-पैर चले और जब उसके पति की मौत हो गई तो उसे मंदिर प्रबंधन ने मंदिर से बाहर निकाल दिया। इस महिला की हालत यह है कि आज उसके हांथ पैर तक नहीं चल रहे और उसे दो वक्त की रोटी के लिए ही नहीं तरसना पड़ रहा है बल्कि सिर छुपाने के लिए कोई जगह भी नहीं है। वह मंदिर से चंद कदम की दूरी पर एक चौराहे में बने घर की ओट पर पिछले तीन सालों से पड़ी हुई है। वह बताती है कि आस-पास के लोग उसे खाने के लिए कुछ ला देते है।
मंदिर प्रबंधन यह बात जरुर स्वीकार करता है कि शांति अपने पति के साथ मंदिर में काम करती थी लेकिन उसे वृध्द होने पर बाहर क्यों निकाला गया। मंदिर प्रबंधन के पदाधिकारियों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। शांति की एक बेटी है जिसकी शादी के बाद उसके पति की भी मौत हो गई है। वह भी उसे कभी-कभार ही देखने पहुंचती है।
शांति कहती है कि उसने तो अपनी जिंदगी का अहम दिन मंदिर में मां भवानी की सेवा में ही गुजार दी। उसके बाद भी उसे यह दिन देखने पड़ रहे है। शायद भगवान को यही मंजूर है। वह मंदिर प्रबंधन को दोष नहीं दे रही है। लेकिन आस-पास के लोग यह कहने से भी नहीं चुकते की कम से कम मंदिर प्रबंधन को चाहिए था कि वह शांति की देख-रेख नहीं कर पाने पर वृध्दाआश्रम पहुंचा देता। उसके कमर में गिर जाने के कारण चोट लगी हुई है और वह इस कारण उठ भी नहीं पाती । वह घर की ओट में नाली के किनारे इस तरह पड़ी हुई है जैसे इस दुनिया में उसका कोई न हो। आस-पास के लोगों ने बताया कि शांति ने अंतरजातीय प्रेम विवाह किया था और उसके पति की मौत मंदिर में काम करने के समय ही दमा से पीड़ित होने के कारण हो गई।
प्रस्तुतकर्ता-दिलीप जायसवाल

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

चुनाव से पहले नक्सलियों का खतरनाक इरादा

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव नजदीक देख नक्सलियों ने अपने खतरनाक इरादे को बीजापुर जिले के पॊगपल्ली में दिखा दिया है। बस्तर में नक्सली मतदाता फोटो परिचय पत्र बनवाने का भी विरोध कर रहे थे। जिसके कारण लोगों ने दहशत के कारण परिचय पत्र नहीं बनवाया। उधर राय के उत्तर में स्थित सरगुजा जिले में भी नक्सलियों द्वारा चुनाव पूर्व किसी बड़ी वारदात को अंजाम दिया जा सकता है। इसे देख सुरक्षा बलों तथा पुलिस के जवानों को एलर्ट कर दिया गया है। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के सरगुजा तथा बस्तर क्षेत्र में नक्सलियों का आतंक पिछले पांच सालों में कम होने की बजाय बढा है। यह जरुर है कि सरगुजा जिले के बलरामपुर पुलिस जिले में पुलिस की सख्त कार्रवाई के कारण नक्सलियों की कमर टूटी है। लेकिन बस्तर के बीजापुर, दंतेवाड़ा तथा दक्षिण बस्तर के आंध्र सीमा से लगे क्षेत्रों में नक्सलियों ने अपना गढ़ स्थापित कर लिया है। कई ऐसे क्षेत्र है जहां आज भी पुलिस तथा सुरक्षा बल के जवान नहीं जाना चाहते। सोमवार को नक्सलियों ने पोंगपल्ली में सीआरपीएफ दल पर हमला कर चुनाव पूर्व अपने खतरनाक मंसूबे से अवगत करा दिया है। नक्सली यहां पहले से चुनाव का विरोध करते रहे है। विरोध में खुलेआम बैनर पोस्टर भी चस्पाया जाता रहा है। नक्सली यहां सबसे यादा भाजपा का विरोध कर रहे है। भाजपा सरकार में ही यहां नक्सल विरोधी जन आंदोलन सलवा जुडूम की शुरुवात हुई और सरकार ने सलवा जुडूम नामक इस आंदोलन को पूरा समर्थन दिया। यह जरुर है कि विधानसभा प्रतिपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा भी इस आंदोलन का समर्थन करते रहे हैं। सलवा जुडूम के कारण बस्तर के कई गांव खाली हो गये और उन्हें कैंपो में रहना पड़ रहा है। नक्सलियों द्वारा यहां उसी राजनीतिक दल को अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव में सहयोग किये जाने की संभावना है। जो सलवा जुडूम के खिलाफत रहते हुए यहां स्थापित हो रहे उद्योगों का विरोध किया है। नक्सली चुनाव पूर्व बस्तर में आतंक की स्थिति बनाने का प्रयास कर रहे है। इससे पुलिस एलर्ट है। पुलिस तनिक भी लापरवाही नहीं बरतना चाहती क्योंकि चुनाव पूर्व नक्सली और भी बड़ी घटना की योजना बनाकर अंजाम दे सकते है। नक्सली आतंक के कारण ही चुनाव आयोग ने छत्तीसगढ़ में दो अलग-अलग तारीखों में चुनाव का फैसला लिया। बस्तर में चुनाव के दौरान सुरक्षा बलो के अलावा सात हेलीकॉप्टरों से भी निगरानी रखी जायेगी। वहीं यहां 14 नवम्बर को मतदान होने के बाद सरगुजा में बीस नवम्बर को मतदान होना है। सरगुजा झारखंड से लगा हुआ है और नक्सली चुनाव से पहले अपना पैठ बना रहे हैं। हालांकि इससे निपटने पुलिस के जवान तैयार हैं। ऐसे में सरगुजा के घोर नक्सल प्रभावित बलरामपुर पुलिस जिले में भी नक्सली किसी वारदात को अंजाम दे सकते हैं।
प्रस्तुतकर्ता‍ दिलीप जायसवाल

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2008

बंधक हजारो लड़किया लूटा रही अस्मत ,सरकार चुप

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा लडकियों के विकास के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। उसके बाद भी राज्य के आदिवासी बाहुल्य जशपुर तथा सरगुजा जिले की हजारों लडकियां महानगरों की सब्जबाग के झांसे में आकर वहां नरक की जिंदगी जी रही हैं। कईयों की मौत के बाद उनकी लाश तक घर नहीं पहुंच पाई। किसी तरह भागकर घर पहुंची लड़कियां विक्षिप्त और रोग ग्रस्त होकर काल के गाल में समा गई। इसके बाद भी अच्छी नौकरी दिलाने के नाम पर इन आदिवासी क्षेत्रों से लड़कियों की तस्करी जारी है। अब तक कई तस्कर भी पकड़े जा चुके है। लेकिन सरकार इस दिशा में गंभीर नहीं हुई है। बंग्लादेश, मिजोरम तथा नेपाल की तरह छत्तीसगढ़ की लड़कियों की तस्करी पिछले सात सालों से बखौफ चल रहा है। लड़कियों को दिल्ली, गोवा जैसे महानगरों का सब्जबाज तथा ऐश की जिंदगी जीने सपना दिखाकर तस्कर अपने जाल में फांस रहे हैं। लेकिन दुभाग्य की बात है कि सरकार द्वारा इस ओर कोई सार्थक पहल नहीं किया जा रहा है। जशपुर में मानव व्यपार के खिलाफ पिछले दो सालों से अभियान चला रही संत अन्ना एनजीओ की सि. सेवती पन्ना बताती हैं कि सन् 2005-07 में किये गये सवरॊ में जशपुर के 98 पंचायतों से 3191 लड़कियों को एजेंटों ने अपने जाल में फांसकर कथित प्लेसमेंट एजेंसियों के हवाले कर दिया। अगर पूरे जशपुर जिले का सर्वे किया जाये तो यह आकड़ा बीस हजार तक पहुंच सकता है। उन्होंने बताया कि दलालों को एक लड़की पर छह हजार से लेकर आठ हजार रूपये तक कमीशन मिलता है। यह कमीशन तब और भी यादा होता है जब लड़की की उम्र बारह से पन्द्रह साल के बीच होती है। जहां से एजेंट लड़कियों को दिल्ली स्थित प्लेसमेंट एजेंसियों के हवाले कर देते हैं। वहां एजेंसी संचालक महिने भर तक लड़कियों को छोटे-छोटे कमरो में पन्द्रह, बीस-बीस की संख्या में रखते है और उनके साथ लड़के भी होते हैं। जहां उन्हें जबरन शराब पिलाई जाती है, ब्लू फिल्म दिखाई जाती है और उन्हें कई लोगों के साथ सेक्स के लिए अभ्यस्त किया जाता है। महिने भर बाद उन्हें रईस जादों के बंगलों में काम करने के लिए भेज दिया जाता है। बंगलों के मालिक प्लेसमेंट एजेंसी के संचालकों से 11 माह के लिए अनुबंध करते हैं। पैसा सीधे लड़की को न देकर प्लेसमेंट एजेंसी के संचालकों को मिलती है। उसका बीस-पचीस फीसदी राशि ही लड़कियों को दी जाती है। प्लेसमेंट एजेंसी में ही लड़कियों के साथ शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना खत्म नहीं होती बल्कि जब ये लडक़ियां रईसों के घर काम करती है वहां भी इनके साथ जानवरों की तरह सलूक किया जाता है। घर मालकिन जहां इन्हें खाना नहीं देकर तथा मारपीट करते हुये प्रताड़ित करती है वहीं दूसरी तरफ इात के साथ खिलवाड़ होता रहता है। कभी बंगले का मालिक तो कभी उसका बेटा और कभी उसका गार्ड व ड्राईवर अपनी हवस मिटाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि जिस हालत में गांव छोड़कर लड़कियां जाती है उस हालत में नहीं लौट पाती। कईयों की तो वहीं मौत हो जाती है और लाश तक का पता नहीं चलता। जशपुर के बगीचा थाना क्षेत्र स्थित महुवाडीह निवासी आलोचना बाई 17 वर्ष की घर लौटते ही मौत हो गई। जबकि तीन अन्य लड़कियां विक्षिप्त अवस्था में घर लौटी । जशपुर में तीन साल के भीतर 11 लड़कियों की मौत हो चुकी है। आलोचना बाई के ईलाज के नाम पर प्लेसमेंट एजेंसी ने तीस हजार रूपये का बिल उसके पिता को थमा दिया और बेटी को किसी तरह घर तक लाने में जमीन जायजाद बिक गई। आलोचना ही एक ऐसी लड़की नहीं है बल्कि सरगुजा जिले के सीतापुर क्षेत्र स्थित राजापुर निवासी एक लड़की की लाश दिल्ली में ही सड़ गई। यह युवती अपनी छोटी बहन के साथ दिल्ली चली गई थी। इस घटना के बाद आशंका जताई जा रही थी कि जब वह गर्भवती हुई होगी तो उस पर गर्भपात का दबाव डाला गया होगा और जब उसने इंकार किया होगा तो उसकी हत्या कर दी गई। इस आशंका पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसी तरह कोट छाल निवासी 17 वर्षीय सीतो बाई को एजेंट द्वारा अपने साथ ले जाया गया था लेकिन कुछ महिने बाद एक सुबह वह घर के बाहर विक्षिप्त अवस्था में पडी हुई मिली। उसके हाथ-पैर बंधे और टूटे हुए थे। मानव तस्क री से सरगुजा और जशपुर के शैक्षणिक संस्थान भी सुरक्षित नहीं रह गये है। सरगुजा जिले के राजपुर विकासखंड स्थित कोदौरा के मिशन स्कूल के हॉस्टल से तीन लड़कियों को एजेंट ने दिल्ली ले जाकर नरक के दलदल में डाल दिया था। इनमें एक गुंगी लड़की भी थी। सरगुजा में मानव तस्करी तथा एड्स जागरूकता के खिलाफ काम कर रहे आशा एसोसिएशन तथा नवा बिहान कल्याण समिति के पदाधिकारियों ने छुटकारा दिलाया। ये दोनों एन.जी.ओ. कुछ सालों से मानव तस्करी के खिलाफ काम कर रहे है। एनजीओ को मानव तस्करी व एड्स के खिलाफ अभियान चलाने के लिए क्रिश्चयन रिलिफ सर्विस द्वारा दो वर्ष पूर्व बजट उपलब्ध कराया गया था। संत अन्ना की सि. सेवती का कहती है कि उन्होंने दिल्ली स्थित 144 प्लेसमेंट एजेंसियों का निरीक्षण किया है और वहां रहने वाली लड़कियों की नरकीय जिन्दगीं को नजदीक से देखा है। दिल्ली में करीब तीन हजार प्लेसमेंट एजेंसियां है और करीब-करीब सभी एजेंसियों का नाम देवी देवताओं तथा धर्म पुरोहितों के नाम से है। इनमें मरियम, गणेश, संत अन्ना, जय माँ दुर्गा, मदर टेरेसा, आदि शामिल हैं। इन नामों का बोर्ड लटके देख किसी को सहसा यकिन नहीं होता कि यहां काम दिलाने के नाम पर लडक़ियों के साथ जल्लाद जैसा व्यवहार भी होता होगा। उन्होंने बताया कि लड़कियों का नाम तथा पता प्लेसमेंट एजेंसी में बदल दिया जाता है ताकि कोई उन्हें ढूंढने जाये तो उसका पता न चले। सरगुजा तथा जशपुर के अलावा रायगढ़ तथा झारखंड एवं बिहार की लड़कियों को भी दलाल अपने जाल में फांस रहे है। झारखंड की तीन लड़कियां मार्च 2006 में गर्भवती हो गई थी। इनमें एक लड़की जयपुर के आबकारी अधिकारी के घर में काम करती थी जहां उसके साथ अधिकारी के प्रमोद नामक बेटे ने बलात्कार किया । जब वह गर्भवती हुई तो कमिश्नर के बेटे ने गर्भपात कराने का दबाव डाला। जब उसने इससे इंकार कर दिया तो एक रात उसे गार्ड के माध्यम से इस रईस जादे के बेटे ने घर से निकाल दिया और वह चेतनालय नामक एक एनजीओ में पहुंची और जहां आप बीती बताई। चेतनालय के डोमेस्टिक वर्कर फोरम ने युवती को जयपुर पश्चिम कोतवाली ले जा कर घटना की रिपोर्ट लिखवाई । फोरम के निर्देशक सिस्टर लेवना बताती हैं कि पुलिस ने अपराध दर्ज कर आरोपी युवक को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन डाक्टरी रिपोट में बलात्कार का मामला नहीं आने पर आरोपी बेल पर न्यायलय से छूट गया । अब मामला न्यायलय में विचाराधीन है पर गरीबी एवं जागरूकता के अभाव में पीडित युवती कोर्ट नही आ रही है। इससे आरोपी युवक न्यायालय से बरी हो सकता है। कई रईस जादे प्लेसमेंट एजेंसियों से लड़कियों को काम पर इसलिए भी रखते है ताकि उन्हें और उनके परिवार के युवकों को शादी के पहले वेश्यालय न जाना पड़े। नवा बिहान कल्याण समिति के नौसाद अली बताते है कि मानव तस्करी की समस्या काफी गंभीर हो गई है। इससे सरगुजा जिले के कुसमी, शंकरगढ़, बतौली, सीतापुर, उदयपुर क्षेत्र सबसे यादा प्रभावित है। सीतापुर, बतौली तथा उदयपुर विकासखंड का निरीक्षण किया गया था जिसमें 762 लड़कियां दिल्ली गई थी। लेकिन उस समय लोग खुलकर बताने को तैयार नहीं थे। संस्था ने आशा एसोसियएशन के साथ मिलकर सर्वे करना शुरु किया तो एक-एक गांव से चालीस-पचास लड़कियां गायब मिली। इसके लिए जागरुकता का कार्यक्रम शुरु किया गया। इसका अच्छा प्रतिसाद देखने को मिला लेकिन सरकार द्वारा इसके लिए कोई बजट नहीं मिलने के कारण वे ठीक से काम नहीं कर पा रहे है। इसी सप्ताह सरगुजा जिले से दिल्ली गई 70 लड़कियों को वापस लाया गया। ये लड़कियां अब भूलकर भी वहां नहीं जाना चाहती। नौसाद बताते है कि दोनों संस्थाओं द्वारा ऐसी लड़कियॊ के अभिभावकों से संपर्क कर पहले तो गुमशुदगी की थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है या फिर बहला फु सलाकर ले जाने की जानकारी पुलिस को दी जाती है। इसके बाद पंचायत से युवती तथा उसके अभिभावक रिश्ता बताते हुये एक प्रमाण पत्र पंचायत से जारी किया जाता है। जिसमें दोनों का फोटो होता है। इतनी कार्रवाई कर अभिभावाकों को दिल्ली भेज दिया जाता है। दिल्ली में मानव व्यापार के खिलाफ काम करने वाले सिस्टर सोफिया व मैक्सिमा युवतियों को जाल से छुडाने अभिभावकों का मदद करती हैं। नौसाद मानव व्यापार रूपी इस पलायन को देह व्यापार का बिगड़ा स्वरूप मानते हुए कहते है कि इससे सरगुजा तथा जशपुर में एड्स की भयावह स्थिति है। अगर जांच की जाये तो चौकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। सिस्टर सेवती पन्ना कहती है कि कई लड़कियां वापस घर आने के बाद दोबारा फिर दिल्ली जाना चाहती है। इसका प्रमुख कारण है कि गांव लौटने के बाद उन्हें समाज दूसरी नजर से देखने लगता है और वे कुंठित रहने लगती है। यही नहीं वहां रहकर ये लड़कियां फ्री सेक्स के लिए स्वतंत्र रहती है। लेकिन यहां वह संभव नहीं होता। सब्जबाग में फंसकर लड़कियॊ के दिल्ली जाने के लिए सेवती पन्ना गरीबी को यादा जिम्मेदार नहीं मानती बल्कि वे नैतिक शिक्षा के अभाव को महत्वपूर्ण मानती है। एनजीओ ने जब लड़कियॊं की तस्करी के खिलाफ काम करना शुरु किया तो मामला खुलकर सामने आया और पुलिस ने भी एजेंटो के खिलाफ कार्रवाई शुरु की। दोनों जिलों में कुछ सालों के भीतर दर्जन भर से अधिक एजेंट पकड़े जा चुके है। इन एजेंटों में महिलाएं तथा स्थानीय लोग भी शामिल हैं। जशपुर के कुनकुरी में एजेंटो के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर उन्हें छोड़ देने का मामला विधानसभा में भी उठा था और गृहमंत्री ने कुनकुरी थाना के तीन पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया था। उसके बाद भी दोनों जिलों सहित दूसरे प्रभावित राज्यों में पुलिस द्वारा एजेंटो पर सख्ती से कार्रवाई नहीं की जाती। जशपुर में बाहरी एजेंटों के अलावा लड़कियॊ की तस्करी में लोहार तथा डोम जाति के लोगों का हाथ भी सामने आता रहा है। यही नहीं जशपुर जिले के सोनकयारी गांव का एक व्यक्ति दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसी चलता है और इसी समय कुनकुरी की दर्जनों लड़किया दिल्ली स्थित श्री गणेश प्लेसमेंट एजेंसी में फसी हुई है। बताया जाता है कि इन्हें जशपुर के बटईकेला निवासी बंटी नामक एजेंट ने एजेंसी के हवाले कर दिया है। जशपुर में लड़कियों को काम दिलाने के नाम पर तस्करी का धंधा सन् 2000 के आस-पास शुरु हुआ था। उस समय लड़कियां खुद काम की तलाश में बड़े शहरों की ओर रुख कर रही थी। लेकिन उस समय इसका पता शायद उस समय किसी को नहीं था कि आने वाले दिनों में इसका भयावाह रूप देखने को मिलेगा। वहीं सरगुजा में इसकी शुरुवात मैनपाठ से हुआ जहां के गलीचा सेंटर वाले क्षेत्र के लड़कियों को बनारस स्थित भदोही के कालीन उद्योग के लिए भेज रहे थे। मैनपाठ से लड़कियों की तस्करी अभी नहीं रूकी है। आशा एसोसिएशन के डायरेक्टर फादर विलियम ने बताया कि संस्था द्वारा इन दिनों सीतापुर क्षेत्र के 50 गांव में लोगों को जागरूक करने के लिए काम किया जा रहा है लेकिन जागरूकता कार्यक्रम में सबसे बड़ी बाधा लोगों द्वारा धर्मान्तरण की गलतफलमी है। दूसरी समस्या पंचायतों से पंचायत प्रतिनिधियों का सहयोग नहीं मिलना है। संस्था के कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली,मुंबई,बंगलोर से पीड़ित होकर लौटी लड़कियों द्वारा गांवो में जाकर लोगों को आप बीती सुनाई जाती है ताकि एंजेटों के बहकावे में दूसरी लड़कियां न आवे। संस्था द्वारा गांव में निगरानी समिति भी बनाई गई है जो गांव में लडकियों को बहला-फुसलाकर ले जाने वालों पर नजर रखती है। लड़कियों की तस्करी को देखते हुये राष्ट्रीय स्तर पर घरेलू कामकाजी महिलाओं तथा लड़कियों के लिए कानून बनाने पर भी विचार किया गया। मार्च 2007 में भी मंत्रालय ने देश भर के सभी राज्यों से महिला बाल विकास तथा एनजीओ के प्रतिनिधियों को इसके लिए आगे आने कहा था। लेकिन छत्तीसगढ़ के एक मात्र सिस्टर सेवती पन्ना इस बैठक में गई थी। अभी तक सरकारी स्तर पर डोमेस्टिक वर्करों के लिए कोई कानून नहीं बनाया जा सका है। प्रस्तुतक‌र्ता दिलीप जायसवाल