मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

राष्ट्रपति की चिंता और उधर सांसदों की जम्हाई

यूं तो हमारे देश के लोकतंत्र का मंदिर शब्द से नवाजा जाने वाला संसद पर इतने दाग लग चुके हैं कि उसे वर्तमान हालात में धोना आसान दिखाई नहीं देता। इसके बाद भी इस मंदिर में बैठने वाले जो भी फैसला लेते हैं उसे देश की जनता कभी लाठी खाकर तो कभी आंसू के गोले के रूप में बर्दाश्त कर लेती है, लेकिन कल जब राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल बजट अभिभाषण पढ़ रही थीं और नक्सलवाद पर चिंता जता रहीं थी, तो संसद में बैठे कुछ सांसद जम्हाई ले रहे थे, तो कुछ सिर पकड़कर ऐसे बैठे थे मानो इन समस्याओं से लड़ने के लिए इनके पास न तो कोई आत्मविश्वास है और न ही इच्छाशक्ति। एक सांसद की आंखें तो इस तरह बार-बार बंद हो रही थी, मानो वे संसद में आराम फरमाने के लिए पहुंचे हैं। वैसे भी इन सांसदों के ऊपर आम जनता का जितना पैसा खर्च होता है, उसका हिसाब अगर इनसे जनता के सेवा करने को लेकर मांगा जाये तो शायद इनके पास कोई जवाब नहीं होगा।

राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल जब खाद सुरक्षा को दुरूस्त करने के लिए कृषि उत्पादकता को बढ़ाने और खुले बाजार की नीति में सुधार करने की बात कर रही थीं, तो इस दौरान कृषि मंत्री शरद पवार अपनी कुर्सी में इस तरह अंगड़ाई ले रहे थे मानों देश के किसानों की लाठी उन्हीं पर पड़ी है। वहीं जब महिला आरक्षक बिल को पारित करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा इस उम्मीद के साथ सांसदों को सम्बोधित किया जा रहा था कि वे इस बिल का समर्थन करेगें, लेकिन यहां भी सांसदों में इसके प्रति कोई गंभीरता नहीं दिखाई दी। यह सब देश की जनता ने भी टेलीविजन में देखा। हालांकि उस दौरान टीवी देखने वाले कितनी गंभीरता से यह सब देख रहे थे, वह अलग बात है। वैसे भी सांसदों के इन रूपों को टेलीविजन के कैमरे भी ज्यादा फोकस नहीं कर रहे थे। जब भी ऐसा दृश्य कैमरे की लैंस में पड़ता तो उस शार्ट को कट कर दूसरा दृश्य दिखाया जा रहा था।

इन सब पर विचार करना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जहां एक तरफ देश में आंतरिक सुरक्षा और घुसपैठ की खतरनाक स्थिति पर जब राष्ट्रपति जब चिंता जाहिर कर रही हों और उनके चेहरे में इन समस्याओं को लेकर उठ रहे सवाल साफ दिख रहे हों, वैसे में हमारे सांसद जब बेफिक्र हो तो समझा जा सकता है कि इस देश की बागदौड़ हम कैसे हाथों में सौंप देते हैं। सिर्फ हर साल विकास दर का लक्ष्य और प्रतिशत घटाने-बढ़ाने के खेल को देश की जनता समझ चुकी है और वह यह भी जानती है कि वह जिन्हें संसद और विधानसभाओं में भेजती है, वे उसकी मंशा पर कितने खरे उतरेंगे, लेकिन इस देश की जनता के सामने अब वर्तमान राजनीति में सही विकल्पों की कमी साफ-तौर पर दिख रही है। यह हालत झारखण्ड में हुए विधानसभा चुनाव में भी साफतौर पर दिखाई दिया था जब झारखण्ड की जनता ने शिबू सोरेन को अपने राज्य का मुखिया बना लिया।

हम यहां सांसद और विधायकों के सोच और विचार पर चिंता नहीं कर रहे हैं बल्कि हम उनकी भी चिंता कर रहे हैं जो राजनीति में आने से अब कन्नी काटते हैं और जो आना भी चाहते है वे राजनीति को एक बिजनेस की समझ के साथ इस ओर चलते हैं। यहां अब मनेजमेंट और एमबीए की बात होती है, वह इसलिए की किसी भी पार्टी के नेताओं को कैसे मैनेज कर रखा जाये, ताकि सब का व्यापार चल सके क्योंकि अब महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस का जमाना इस राजनीति में नहीं दिखाई देता क्योंकि आज का युवा राजनीति में पूर्ण सम्पन्नता पाने के लिए जाना चाहता है। ऐसा हो भी क्योंकि नहीं जब राजनीति ही नहीं बल्कि इस समाज का हर पेशा और कार्य इसी उम्मीद से आगे बढ़ रहा है।

हालत यही रहा और इस देश का सफर ऐसा ही चलता रहा तो ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है, सारी की सारी हकीकत सामने आयेगी और खास कर अमीर और गरीब के बीच बन रही खाई में एक दिन सभी को गिरना ही पडे़गा।
-दिलीप जायसवाल

2 टिप्‍पणियां:

vinay ने कहा…

इन सांसदो को जनता से कोई मतलब हो,तब तो यह सासंद राष्ट्रपति जी की बातो पर ध्यान देते ।

govind ने कहा…

chupe rusam ho yar,
good artical